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Friday, February 21, 2014

WTO द्वारा थोपा गया वैट

हम लोगों ने पहले सत्र में विश्व व्यापर संयोजन समझौता  और कृषि विषय पर होने वाले दुष्प्रभाव खास कर किसानों के उपर होने वाले  दुष्प्रभाव के बारे में कुछ बातचीत की। अभी विश्व व्यापर संयोजन समझौते में, जैसा मैंने आपसे कहा, लगभग दो हज़ार शर्तें हैं। दो हज़ार में से कुछ शर्तों पर सवेरे बात हुई उसी विश्व व्यापर संयोजन समझौते में एक शर्त है, जिसके आधार पर हमारे देश में सरकार ने मूल्य वर्धित कर (value added tax) देश में लागू करने का फ़ैसला किया है। फिलहाल हमारे देश में अट्ठारह राज्यों में 1 अप्रैल 2005 से मूल्य वर्धित कर लागू किया है। बाकी बारह राज्यों ने मना कर दिया है की हम लागू नहीं करेंगे। हमारे देश में मूल्य वर्धित कर के बारे में WTO का जो समझौता है उसकी शर्त क्या है जिस पर सरकार जोर दे रही है ? विश्व व्यापर संयोजन समझौते में एक शर्त है कि टैक्स का ढांचा ऐसा होना चाहिये जो दूसरे देशों में किया हुआ है या बनाया हुआ है। अब दुर्भाग्य या सौभाग्य जो भी कहिये, WTO पर जो हस्ताक्षर करने वाले देश हैं, उनमें से अधिकांश देशों में VAT है, सभी देशों में नहीं है। WTO समझौता  जिन्होंने माना है उनमें एक देश है अमेरिका जहां पर VAT नहीं है। इसी तरह जिन देशों ने WTO पर हस्ताक्षर किया है उन में एक देश है इराक। इराक, ईरान में VAT नहीं है।  इसी तरह लेटिन अमेरिका के कई देशों में VAT नहीं है। लेकिन यूरोप के कई देशों में VAT है। फ्रांस, स्वीडन, जर्मनी, स्विट्ज़रलैंड, डेनमार्क, नॉर्वे आदि कई देशों में VAT  है।

तो हमारे देश में पहली बार जो बात VAT लाने के लिए सरकार द्वारा कही गई है, वह यह है कि  विश्व व्यापर संयोजन समझौते की शर्त है इसलिए हमको VAT लाना है। शर्त क्या है कि जैसा अधिकाँश देशों में है वैसी व्यवस्था आपको करनी है। और अधिकाँश देशों में VAT है तो भारत में भी आपको VAT लाना है - यह एक शर्त है। अब हमारे देश की सरकार VAT के बारे में इतना तो कहती है कि विश्व व्यापर संयोजन समझौते की शर्त के अनुसार हम VAT ला रहे हैं लेकिन विश्व व्यापर संयोजन समझौते में यह कहीं पर नहीं है कि VAT कैसे लाना है, किन आधारों पर लाना है, उसकी टैक्स दर कितनी रखनी है, उसके कितने स्लैब बनाना, उसका कैसे वर्गीकरण करना, उसमे पेनल्टी क्या होगा, उसमे प्रोत्साहन क्या होगा, यह सब कुछ नहीं है। बस  उसमे यही शर्त है की जैसा दूसरे देशों में किया हुआ है वैसा लाइए। सरकार आधा सच बोल रही है और आधा छुपा रही है। जैसा दूसरे देशों में किया हुआ है वैसा VAT लाइए, ऐसा उसमे है। लेकिन हिंदुस्तान की सरकार VAT तो ला रही है परन्तु दूसरे देशों जैसा नहीं ला रही। दूसरे देशों में जो VAT है, उसकी स्थिति भारत की तुलना में अलग है। 123 देशों में जहाँ जहाँ VAT है, वहां सभी जगहों पर सरकरों ने बाकी सभी तरह के टैक्स ख़त्म कर के  VAT  लगाया है जबकि भारत सरकार सभी दूसरे टैक्स के साथ VAT ला रही है - सबसे बड़ा अंतर यह है। फ्रांस, स्वीडन, जर्मनी, स्विट्ज़रलैंड, डेनमार्क, नॉर्वे आदि जो देश हैं, जहाँ जहाँ पर VAT है, वहां पर  उत्पाद शुल्क (Cental Excise) नहीं है; राज्य उत्पाद कर (State Excise duty ) नहीं है; CST नहीं है,  SST नहीं है सर्विस टैक्स नहीं है, प्रोफेशनल टैक्स नहीं है, नगर निगम कर नहीं है; रोड टैक्स नहीं है, टोल टैक्स नहीं है, एंट्री टैक्स नहीं है, एग्जिट टैक्स नहीं है, ये सारे के सारे टैक्स उन लोगों ने ख़त्म कर दिए हैं फिर VAT  को लागू किया है। हमारे देश की सरकार सभी दूसरे टैक्स के साथ VAT लागू कर रही है।

तो अंतर यह हुआ की सारे दूसरे टैक्स ख़त्म करने के बाद अगर VAT लागू किया जाये तो बहुत लाभ होता है। सरकार को भी लाभ होता है और जनता को भी लाभ होता है। जनता को लाभ होता है की टैक्स कम होने से वस्तुएं सस्ती हो जाती हैं। अगर 14-15 तरह के टैक्स हों और उनको हटा कर एक ही टैक्स रह जाये तो वस्तुएं सस्ती हो जाती हैं और वस्तुओं के सस्ता होने से बिक्री अधिक हो जाती है और उससे सरकार को टैक्स ज्यादा मिलता है और इससे खज़ाने मैं पैसा ज्यादा जाता है। व्यापारी वर्ग सहित सबको लाभ होता है। अब देखिये, प्रत्यक्ष कर की श्रेणी में दो ही कर आते हैं - आयकर अर्थात इनकम टैक्स और निगम कर अर्थात कॉर्पोरेट टैक्स। कॉर्पोरेट टैक्स भी इनकम टैक्स ही है पर वह कंपनियों पर लगता है। और इनकम टैक्स व्यक्तिगत लोगों पर लगता है। अप्रत्यक्ष कर ढेर सारे जैसे कि उत्पाद शुल्क (Cental Excise) , राज्य उत्पाद कर (State Excise duty ) , CST ,  SST , सर्विस टैक्स , प्रोफेशनल टैक्स ,  रोड टैक्स , टोल टैक्स , एंट्री टैक्स , एग्जिट टैक्स आदि। जिन देशों ने बाकी सब टैक्स हटा कर VAT लगाया है वहां की जनता प्रसन्न है। हमारे देश की सरकार क्या करने जा रही है की सारे के सारे टैक्स ज्यों के त्यों रख कर VAT लगाने जा रही है जिसका अर्थ है कि  कोई टैक्स कम नहीं हो रहा है बल्कि एक नया टैक्स बढ़ने जा रहा है। इसका परिणाम यह होगा कि वस्तुएं और महंगी हो जाएँगी। हमारे भारत देश में जिन राज्यों में 1 अप्रैल 2005 से  VAT आया है, उनकी संख्या 18 है।उन राज्यों में वस्तुओं के दाम 15 से 20 प्रतिशत बढ़ गए हैं। जैसे, स्कूटर, मोटर साइकिल, कार आदि के दाम 15 से 20 प्रतिशत बढ़े  हैं। और ये स्कूटर, मोटर साइकिल, कार आदि एक विशेष  वर्ग के काम आने वाली वस्तुएं हैं; परन्तु जो आम आदमी के काम आने वाली वस्तुएं जैसे आटा , चावल, बेसन आदि हैं सबके दाम भी बढ़ गए हैं, घर में काम आने वाले तेल मसाले आदि का दाम बढ़ गया क्योंकि जो टैक्स पहले थे वो तो ज्यों के त्यों रहे, VAT  और लग गया। तो इसलिए यहाँ महंगाई बढ़ेगी। महंगाई बढ़ेगी तो लोगों को तकलीफ होगी। वैसे ही इस देश में बहुत ज्यादा टैक्स हैं, VAT  आने के बाद महंगाई और बढ़ेगी। देखें हमारे देश में क्या होता है और दूसरे  देशों में क्या होता है। दूसरे  देशों में जो VAT  होता है वेह सिंगल पॉइंट पर होता है अर्थात एक बार दिया जाने  वाला। भारत में जो  VAT  आया है, वेह बहुत सारे बिन्दुओं पर - मल्टीप्ल पॉइंट्स - पर है। हमारे यहाँ एक वस्तु को जितनी बार बेचो, उतनी बार टैक्स। जैसे मैंने इनसे कोई वस्तु 100 रुपये में खरीदी, तो क्योंकि इन्होने मुझे बेचीं तो ये उस पर VAT भरेंगे; मैं उसी वास्तु को 150 रुपये में बेचूं तो फिर VAT  भरूँगा; उसे फिर कोई 200 रुपये में बेचे तो फिर उस पर VAT  भरेगा। तो जितनी बार वेह एक वास्तु बिकती रहेगी, उतनी बार उस पर टैक्स लगता रहेगा।भारत में इस तरह का VAT  आ रहा है।

दूसरे देशों में क्या है कि एक बार अगर VAT  दे दिया तो वह वस्तु जितनी बार भी बिके, उसपर दुबारा कोई टैक्स नहीं है। तो जिन देशों में सिंगल पॉइंट VAT  है, उन देशों में बहुत मज़ा है। एक ही बार देना है टैक्स तो व्यापारी भी खुश है, ग्राहक भी खुश है, उत्पादन करने वाला भी खुश है। इसके अतिरिक्त, जिन देशों में सिंगल पॉइंट VAT  है, उन्होंने एक नियम बना रखा है, और वह बहुत अद्भुत नियम है। यहाँ हम ऐसे नियम की सिर्फ कल्पना कर सकते हैं या सपने में सोच सकते हैं। वेह नियम यह है कि  जब व्यापारी VAT  भरता है तो उस व्यापारी का खाता सरकार के पास और उस व्यापारी के पास रहता है। जैसे की आपने इस साल 10000 डॉलर टैक्स दिया, पिछले साल 20000 डॉलर टैक्स दिया और उससे पिछले साल 50000 डॉलर टैक्स दिया तो सरकार सर्टिफिकेट देती है की आपने इतना VAT  जमा कराया। फिर अगर आपको कोई तकलीफ आई  - तकलीफ क्या आई, जैसे आपका बिज़नस चौपट हो गया, भूकंप आया या सुनामी आ गयी, उसमे आपकी दूकान डूब गई या फैक्ट्री डूब गई या आग लग गयी तो जो आपने टैक्स भरा है वह पूरा का पूरा आपको वापिस मिलेगा जिससे आप व्यापार दुबारा शुरू कर सकें। सभी यूरोप के देशों में VAT  इस हिसाब से लगता है।अर्थात व्यापारी को मालूम है कि  उसका दिया हुआ टैक्स का एक एक पैसा सुरक्षित है, जब ज़रुरत पड़ेगी तो उसको मिल जाएगा। ज़रुरत नहीं है तब तक सरकार उसको इस्तेमाल कर रही है और उस पर ब्याज दे रही है। ब्याज की दर अनेक देशों में अलग अलग है। सामान्य रूप से सबसे कम ब्याज की दर है डेढ़ प्रतिशत और सबसे अधिक दर है साढ़े पांच प्रतिशत। अर्थात आपका दिया हुआ टैक्स एक तरह से बैंक में रखा हुआ है जिस पर बैंक आपको ब्याज दे रहा है; ऐसे ही सरकार आपको ब्याज देती है।अर्थात आपका दिया हुआ टैक्स आपका धन है जिसको आप जब ज़रुरत पड़े निकाल कर इस्तेमाल कर सकते हैं। ज़रुरत ऐसी होनी चाहिए जैसा मैंने आपको बताया। अगर आपको नुक्सान नहीं है तो आप उसे नहीं निकाल सकते। अगर आपको नुक्सान हो गया है तो सरकार आपको खुद बुला कर आपको पैसा दे देगी कि  आप दुबारा व्यापार शुरू करो। जब आप VAT  देने लायक हो जाएँ तो फिर आप जमा कर देना - यह व्यवस्था  है। भारत में क्या आप ऐसी कल्पना भी कर सकते हैं? हिंदुस्तान की आज़ादी के इतिहास के पिछले 57 साल में सरकार ने जितने टैक्स लिए हैं, कभी आपको ऐसा लगा की आपके दिए हुए पैसे को आपको वापिस दे दे उपयोग करने के लिए ? यहाँ की सरकार तो जोंक की तरह से जैसे खून पीते रहना, पीते रहना, पीते रहना, उस स्थिति में है। वापिस देने की तो कोई कल्पना नहीं।

और एक दिलचस्प बात।जिन देशों में VAT  है - यूरोप के देशों में सबसे पहले VAT  आया; दुनिया में सबसे पहले VAT  लगाने वाला देश है जर्मनी - उन देशों में टैक्स की अधिकतम दर 6% है। 6% से ज्यादा किसी भी वस्तु  पर VAT  नहीं है। भारत में क्या स्थिति है - यहाँ अधिक से अधिक VAT  20% है। जैसा कि  आपको मालूम है, भारत में VAT  की दर के 4 स्तर  हैं - एक है जिस पर जीरो  VAT  है, एक है जिस पर साढ़े चार % VAT  है, एक है जिस पर साढ़े बारह % VAT  है और एक चौथी स्लैब जिस पर 20% VAT  है। 20% VAT वाली जो वस्तुएं हैं वे पेट्रोलियम उत्पाद हैं, जैसे डीजल, पेट्रोल, क्मित्ति का तेल, CNG आदि। यूरिया, सुपर फॉस्फेट, DAP आदि सब पेट्रोलियम उत्पादों में आते हैं और उन पर भी 20% के हिसाब से है। और वहां देशों में 6% से अधिक कहीं भी नहीं है। जर्मनी में VAT  की दर सबसे अधिक है और वह 6% है। तो वहां 6% है और वह एक बिंदु पर है, एक बार देदिया तो छुट्टी हो गयी  जबकि यहाँ 20% है और बार बार है। मैंने अभी थोड़े दिन पहले हिसाब निकाला । सामान्य रूप से कारखाने में कोई वस्तु बनती है और ग्राहक तक पहुँचती है उससे पहले वह 3 - 4 - 5 हाथों में से गुज़रती है। डिस्ट्रीब्यूटर, थोक विक्रेता, खुदरा विक्रेता और अन्य कड़ी भी हो सकती हैं। तो सामान्य रूप से वास्तु 4 -5 हाथों में गुज़र कर वहां तक पहुँच रही है। 20% वाली वास्तु पर मैंने हिसाब जोड़ा है तो अगर  20% VAT  की  दर 4 जगह हम मान लें तो टैक्स 34% आता है। जबकि विदेशों में 6% है।  तो उनके यहाँ क्यों VAT  सफल है। यहाँ कम क्यों नहीं हो सकता इसका एक और कारण है। विदेशों में जो VAT  लागू करने वाले अधिकारी हैं उनको कोई अधिकार नहीं है सिवाय इसके कि  वे टैक्स इकठ्ठा करें और खजाने में जमा करें।बाकी कोई अधिकार नहीं है। बाकी सब उनकी ड्यूटी है, अधिकार कुछ नहीं है। अब इसमें अंतर समझिये। कर्त्तव्य है, अधिकार कुछ नहीं है। वहां तो उनको अधिकारी भी नहीं कहा जाता, टैक्स कलेक्टर कहा जाता है। वे ऑफिसर नहीं हैं कलेक्टर हैं। और उनके यहाँ कलेक्टर के पास कोई अधिकार नहीं हैं सिवाय इसके की वह आप के पास आये और आप के पास जो VAT  की धन राशि है उसे खजाने में जमा कर दे। इससे ज्यादा कुछ नहीं। इसके विपरीत भारत में जो कलेक्टर है उसको सरकार ने सब तरह के अधिकार दे दिए। कैसे अधिकार- जैसे कि  VAT  को लागू करवाने वाला जो अधिकारी है वह   टैक्स ऑफिसर होने वाला है या सेल्स टैक्स ऑफिसर या सेल्स टैक्स कमिश्नर या सेल्स टैक्स इंस्पेक्टर यानी सेल्स टैक्स अर्थात बिक्री कर विभाग जो है उसी को सरकार VAT  की ज़िम्मेदारी देने जा रही है। तो जो VAT  इकठ्ठा करेगा उसे यहाँ क्या क्या अधिकार हैं - जो अधिकारी VAT  ले रहा है वह कभी भी आपकी दूकान में आ सकता  है।और आपका कैश चेक कर सकता है, आपका जो गल्ला है जहाँ आप कैश रखते हैं उसको खोल कर चेक कर सकता है, नोट गिन सकता है कि  इसमें कितना रखा हुआ है। फिर आपके गल्ले में जितना कैश  है उसका आपके पास हिसाब होना चाहिए। मान लीजिये मेरे गल्ले में दस हज़ार रूपया निकला तो दस हज़ार रुपये का मैंने सुबह से क्या बेचा है उसका हिसाब होना चाहिए चाहे उसमें दस पैसे की चीज़ बेचीं ही चाहे दस हज़ार की बेची हो। और अगर कोई हिसाब नहीं देता है तो वह उसी समय जुर्माना करेगा और जुर्माने की न्यूनतम राशि दस हज़ार रुपये है। अर्थात अगर अपने दस पैसे का लें दें किया है और आपके पास उसका कागज़ नहीं है तो दस हज़ार रुपये का जुर्माना कर सकता है। उसने अगर दस हज़ार रुपये का जुर्माना किया तो वह समय देगा की तीन दिन में भरना, या दो दिन में भरना या पांच दिन में भरना। और अगर आप ने नहीं भरा तो उसे अधिकार है कि वह आपके घर की मोटर  साइकिल  उठा कर ले जाएगा, साइकिल  उठा  कर  ले  जायेगा,  कार  उठा कर  ले  जायेगा  और  उसे  बेचकर  दस  हज़ार  रुपये  निकाल  लेगा। यह उसको अधिकार है।

और इसके भी आगे - अगर आपने जुर्माना नहीं भरा तो आपके बैंक में जा सकता है। और  बैंक को यह आदेश है कि किसी व्यापारी का अगर कोई खाता है तो उसे VAT  अधिकारी को उसका विवरण दे। बैंक इसके लिए बाध्य है। तो वह आपका बैंक खता चेक करेगा और उसमे अगर दस हज़ार से ज्यादा रक़म है तो उसे निकाल लेगा। तो आपका जुरमाना निपट गया। आपको बता दिया जायेगा की आपके खाते से निकाल लिया गया है। और अगर आपके बैंक खाते में कुच्छ नहीं मिला तो आपके घर चला जायेगा। आपके घर का लाकर तुडवा सकता है उसमें अगर आपकी पत्नी के गहने रखे हैं तो उनको ले जाकर बेच   लेगा। आप के घर में उसे कोई भी संपत्ति मिल जाये जो दस हज़ार रुपये से ज्यादा है तो उसे ले जाकर बेचकर जुर्माना वसूल कर सकता है। और अगर आपके घर में कुच्छ भी नहीं है और उसको जुर्माना वसूलना है,  और अगर आप घर में नहीं हैं तो आपकी गिरफ्तारी का वारंट निकलवा सकता है। और अगर गिरफ्तारी में आप पेश नहीं हो पाए तो आपकी पत्नी की गिरफ्तारी करा सकता है। अगर आपके घर में पत्नी नहीं हैं , बहिन है तो बहिन की गिरफ्तारी करा सकता है। मान लो बहिन भी नहीं है, बहिन के पति हैं तो उनकी गिरफ्तारी करा सकता है। अगर आपके घर में शादीशुदा बेटी है तो उसले पति अर्थात आपके जमाई की भी गिरफ्तारी करा सकता है। इतने अधिकार उस अधिकारी को  दिए हुए हैं।दुर्भाग्य हमारे देश का यह है की ये सब अधिकार उस विभाग को दिए जा रहे हैं जो  महा दुष्ट है, महा हरामखोर है। आप जानते हैं कि सेल्स टैक्स डिपार्टमेंट में कितना भ्रष्टाचार है और कितने घोटाले होते हैं। अभी थोड़े दिन पहले मैंने टीवी पर आजतक न्यूज़ चैनल पर देखा था कि  दिल्ली का जो सेल्स टैक्स विभाग है, जहां कमिश्नर स्तर  का अधिकारी बैठता है, दिल्ली की सरकार की नाक के नीचे, वहां चौरासी अधिकारी हैं वहां बिना रिश्वत के कोई फाइल भी इधर से उधर नहीं करते। और उस सेल्स टैक्स ऑफिस में गज़ब का समाजवाद है। सोशलिज्म है। दुनिया में कहीं सोशलिज्म है तो वह है सेल्स टैक्स विभाग में, दिल्ली में। सुनिए, वह कैसा सोशलिज्म है - अधिकारी जब सवेरे दफ्तर में आता है, तो अपनी साड़ी जेब झाड कर आता है। एक रूपया भी उसकी जेब में नहीं होगा। जब शाम को वापिस घर जाता है तो क्लर्क ग्रेड के अधिकारी के पास कम से कम ढाई तीन हज़ार रूपया होता है और कमिश्नर रैंक के अधिकारी के पास पचास साठ  हज़ार से आगे कुछ भी हो सकता है। यह आजतक टीवी चैनल पर हमने  देखा। और होता क्या है कि ये सब कर्मचारी इकट्ठे होकर पैसा वसूलते हैं। हर चीज़ के रेट फिक्स हैं। फाइल यहाँ से यहाँ  तो इतना और यहाँ से यहाँ आयेगी तो इतना। इस तरह सब पैसा वसूलते हैं। इकठ्ठा हुआ पैसा शाम को पांच बजे पूल किया जाता है। देखिये समाजवाद कितना ज़ोरदार है वहां, सुनने की बात है। जिस जिस अधिकारी ने दिन में घूस खाई है, वे शाम को पांच बजे मेज़ पर सब पैसा निकल कर इकठ्ठा रख देते हैं और गिनते हैं फिर उसके बाद बंटवारा होता है। बंटवारे का नियम यह है की कमिश्नर  को ज्यादा, उससे नीचे को कुछ कम, उससे नीचे को कुछ और कम आदि, आदि। अंत में चपरासी को भी मिलता है। तो शाम को सामान्य  क्लर्क  की  जेब में   तो तीन - साढ़े  तीन हज़ार होते हैं और कमिश्नर की जेब में पचास हज़ार से अधिक कुछ भी हो सकता है। यह हाल है दिल्ली के सेल्स टैक्स विभाग का। जब दिल्ली में यह हाल है जहाँ केंद्र सरकार की राजधानी है और राज्य सरकार की राजधानी है तो भिलाई में,  रायपुर में, बिलासपुर में जौनपुर में जाने क्या हाल होता होगा। ऐसे भ्रष्टाचारी, हरामखोर अकर्म्चारियों को इतने अधिकार दे देना वैसा ही है जैसे बन्दर के हाथ में उस्तरा दे देना की वह गला रेतता रहे। अगर यह अधिकारी आपसे खुंदक खा गया तो रगड़ देगा, इतने अधिकार हैं उसके पास। और मज़े की बात यह है की अधिकारी अगर ग़लती करे तो उसके खिलाफ आप कुछ  नहीं कर सकते। VAT  मैं ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। सेल्स टैक्स में तो यह है कि  अधिकारी ने अगर ग़लती की तो उसके खिलाफ आप कोर्ट में जा सकते हैं। सेल्स टैक्स के अपने कोर्ट हैं, इनकम टैक्स के अपने कोर्ट हैं आप वहां जा सकते हैं, हाई कोर्ट में जा सकते हैं, सुप्रीम कोर्ट में तो जा ही सकते हैं। VAT  का अधिकारी अगर आपके खिलाफ कोई ग़लती करे तो आप उसकी शिकायत कहीं नहीं कर सकते - ऐसा कोई फोरम नहीं है। सरकार कह रही कि  हम इस पर विचार करेंगे, थोड़े दिन में करेंगे पर अभी नहीं है। ऐसे अधिकारियों  को इस प्रकार के अधिकार दे देना कि संपत्ति ज़ब्त कर लेने का अधिकार, आपके वारंट जारी करने का अधिकार, आपको गिरफ्तार कराने का अधिकार, आपके बैंक से पैसा निकाल कर जुर्माना वसूल करने का अधिकार, आपकी संपत्ति बाज़ार में बिकवा कर जुर्माना वसूल करने का अधिकार। ये इतने खतरनाक अधिकार हैं की जो अंग्रेजों ने भी इस देश में किसी कलेक्टर को नहीं दिए थे वह भारत की सरकार VAT  के अधिकारियों  को दे रही है।

अब इस में मज़े की बात यह है कि  WTO  की शर्तों में यह कहीं भी नहीं लिखा हुआ है। WTO  में सिर्फ इतना लिखा है कि  जैसे दूसरे  देशों में VAT  है, वैसे आप भी लाइए। लेकिन दुसरे देशों में इतना सरल और आसान  VAT  है, उसे यहाँ लाने की कोशिश नहीं। और सबसे महत्त्व की बात - जिन देशों में VAT  है ( यूरोप और  पडोसी देशों  में) एक अद्भुत नियम है कि  VAT  इकठ्ठा करने वाले को वेतन नहीं मिलता, कमीशन मिलता है। जैसे अगर आपने 1000 डॉलर VAT  इकठ्ठा किया तो 1% कमीशन आपको मिला या फिर  2%  । 2% से अधिक कहीं नहीं है। वेतन, भत्ता  आदि कुछ भी नहीं है। बस इस कमीशन की आमदनी से उसे अपना घर चलाना होता है। किसी भी VAT   इकठ्ठा करने वाले को सरकार से घर नहीं मिलता। जैसे यहाँ VAT  कमिश्नर को सरकारी बंगला मिलता है वैसे किसी और देश में VAT  इकठ्ठा करने वाले को नहीं मिलता। उनको किराये के घर में रहना है या फिर अपने घर में रहना है। सरकारी कार नहीं मिलती, अपनी कार रखनी है। उसके डीजल और रख-रखाव के खर्चे खुद करने हैं। मोबाइल सरकार नहीं देती, मोबाइल अपना रखना है। टेलीफोन सरकार नहीं देती, टेलीफोन का खर्च आपको खुद वहन  करना  होता है। कोई सरकारी  सुविधा नहीं - सरकार आपको कमीशन दे रही है उससे आप सुविधाएँ बनाइये। हर अधिकारी को एक एरिया बाँट दिया जाता है। उस एरिया में आप VAT  इकठ्ठा करते रहिये और अपना कमीशन लेते रहिये, व्यवस्था चलाते रहिये। और इससे भी मज़े की बात, एक साल के बाद उस अधिकारी से VAT  इकठ्ठा करने का काम वापिस लिया जाता है। कम से कम एक साल और अधिक से अधिक तीन साल। हर हालत में तीन साल के बाद उससे काम वापिस लिया जाएगा। फिर वेह अधिकारी दुबारा अगर टैक्स वसूलने का काम करना चाहे तो उसे सरकार की एक परीक्षा पास करनी पड़ती है। उस  में  के  उसे एक  सरटिफिकेट देना   पड़ता है। यह सर्टिफिकेट उसे टैक्स भरने वाला नागरिक देता है। सर्टिफिकेट यह होता है कि  यह अधिकारी बहुत ईमानदार है, यह बहुत मेहनती है, बहुत कर्मठ है, कोई अपशब्द नहीं बोलता है, इसको गुस्सा नहीं आता है, यह कभी गाली नहीं देता है, यह टैक्स अदा  करने वालों  के साथ इज्ज़त से पेश आता है। ऐसे उसमें 8-10पॉइंट रहते हैं जो टिक करने होते हैं।जब अधिकारी ऐसा सर्टिफिकेट लाकर जमा करेगा तभी सरकार उसे दुबारा टैक्स वसूलने के काम के लिए परीक्षा में बैठने की अनुमति देती है।  तो जो टैक्स इकठ्ठा करने वाला है उसके सिर पर हमेशा तलवार लटकती रहती है कि  अगर माइन थोडा भी बदतमीज़ी की तो मेरा करैक्टर सर्टिफिकेट गया। इसलिए वह टैक्स देने वालों से कभी भी बदतमीज़ी नहीं करता और न ही उनको हैरान परेशान करता है। कुछ देशों में इस तरह इम्तिहान देना पड़ता है जबकि कुछ देशों में जैसे नार्वेजियन देशों में टैक्स इकठ्ठा करने वाले कर्मचारियों को चुनाव लड़ना पड़ता है, इलेक्शन में खड़ा होना पड़ता है और उसे अधिकतम वोट मिलें तो वह यह काम दुबारा कर सकता है। और वोट उसको कौन देता है - वही जो टैक्स देने वाला होता है। ऐसी व्यवस्थाएं हैं जहां पर VAT  लागू है और बहुत सफल है। जनता बहुत खुश है क्योंकि जनता ऊपर है और टैक्स वसूल करने वाला नीचे है। जनता थोड़ी भी नाराज़ हो गई तो अधिकारी की खैर नहीं। तो इसलिए अधिकारी बिलकुल सीधे काम करता है। और अधिकारी को अधिकार कुछ नहीं है। बस टैक्स इकठ्ठा करो, खजाने में जमा करो, अपनी कमीशन लो और अपने घर रखो बाकी सरकार का। और सरकार क्या करती है, उसको संभाल कर रखती है आपको ज़रुरत पड़ी तो आपको दे देती है। तो जनता इतनी खुश है कि  सरकार के खिलाफ कोई आन्दोलन नहीं, धरना नहीं, कोई प्रदर्शन नहीं। टैक्स के मामले में इन देशों में सारा  काम बहुत सुचारू रूप से चलता है। आपने कभी अखबार में नहीं पढ़ा होगा कि  जर्मनी के व्यापारियों ने बंध  किया। पिछले पचास साल में तो मैंने किसी अखबार में नहीं देखा। मेरी उम्र हालाँकि पचास साल नहीं है परन्तु उससे पहले के समाचार पत्रों में यह नहीं मिला कि  वहां के  व्यापारियों ने बंध  किया या जर्मनी के उद्योगपतियों ने कभी बंध  किया या प्रांत के व्यापारियों ने बंध  किया क्योंकि व्यापारी और उद्योगपति बहुत खुश हैं। वहां बंध  होते हैं सरकारी अधिकारियों के द्वारा। कई देशों में क्या होता है की दो ही टैक्स हैं - VAT  और इनकम टैक्स। और कुछ देश तो ऐसे हैं जहाँ इनकम टैक्स भी नहीं है सिर्फ एक ही टैक्स है - VAT . जैसे स्विट्ज़रलैंड में इनकम टैक्स नहीं है, सिर्फ VAT  है। इसी तरह लक्सेम्बर्ग और पनामा नाम के देशों में इनकम टैक्स नहीं है, सिर्फ VAT  है। कुछ देश ऐसे हैं जहां इन दो टैक्स के अलावा तीसरा टैक्स है और वह है कस्टम ड्यूटी। इस प्रकार अधिक से अधिक तीन और कम से कम एक टैक्स इन देशों में है। भारत में अगर मैं सब टैक्स जोड़ दूँ तो अधिक से अधिक 43 तरह के टैक्स हैं, और कम से कम की यहाँ कोई व्यवस्था नहीं है। तो ऐसी स्थिति में हिंदुस्तान में VAT  आने वाला है या आगया है तो देखें इसके दुष्परिणाम क्या हैं। सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह है कि   चीज़ें महंगी होंगी।
दूसरे , भ्रष्टाचार इतना बढेगा देश में जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। तीसरे सरकार यह कह रही है की दस लाख से कम व्यापार करने वालों को VAT  नहीं देना पड़ेगा। लेकिन उनको VAT  का रिटर्न फाइल करना पड़ेगा। यानी  वत्नाहीं देना परन्तु रिटर्न फाइल करना पड़ेगा। जैसे, इनकम टैक्स में चाहे आप टैक्स न दें परन्तु आपको रिटर्न फाइल करना पड़ेगा। और अगर आपने रिटर्न फाइल नहीं किया तो जुर्माना। अब देखिये की हमारे देश में 80% से अधिक व्यापारी ऐसे हैं जो 10 लाख से कम का व्यापार करते हैं। जैसे सब्जी बेचने वाले, चाट पकोडी  बेचने वाले, दाल बेचने वाले, आटा  बेचने वाले आदि छोटे व्यापारी, इन सबको VAT  का रिटर्न फाइल करना है। अब कहाँ रिटर्न फाइल करें, कहाँ जाएँ, किसको पूछें, कोई बताने वाला नहीं। और अगर नहीं फाइल करेंगे तो जुर्माना। तो अब होगा क्या कि  ये VAT  ऑफिसर इनको चूसेंगे। अब कल्पना करो की कोई भिलाई शहर में सड़क पर पानी पूरी बेचता है, चाट बेचता है, उसको आप कहेंगे कि  VAT  रिटर्न फाइल करना है तो वह आपका मुंह देखेगा कि  यह VAT  क्या होता है। उसे कोई बताने नहीं गया। लेकिन आफत उसके ऊपर आने वाली है थोड़े दिन में। कब आएगी ? अभी छत्तीसगढ़ सरकार ने कहा है कि  वह VAT  को थोड़े दिन के लिए ससपेंड कर रही है लेकिन रद्द नहीं कर रहे। थोड़े दिन बाद लगा देंगे। यहाँ लग गया तो छोटे छोटे व्यापारियों के लिए तो मरने की हालत है। बड़े व्यापारी भी मरेंगे लेकिन छोटे पहले मरेंगे। बड़े कैसे मरेंगे ? आप VAT  भर कर रिटर्न फाइल कर रहे हैं तो VAT  रिटर्न भरने का मतलब है कि  आप अपनी थोड़ी भी इनकम छुपा नहीं सकते। और इनकम नहीं छुपा सकते तो इनकम टैक्स वाले तैयार बैठे हैं आपकी गर्दन दबोचने के लिए। तो इधर आप VAT  रिटर्न भरिये और उधर इनकम टैक्स की रेड के लिए तैयार रहिये। भारत की सरकार यह कहती है कि  VAT  आने से ब्लैक मनी छुप नहीं पायेगा, और वह इसलिए नहीं छुप पायेगा की जब आप रिटर्न फाइल करेंगे तो ऑफिसर को यह अंदाजा हो जायेगा कि  आपकी इनकम कितनी है क्योंकि रिटर्न में आप यह भी बताएँगे की लाभ कितना है। और इनकम टैक्स आपसे वसूला जायेगा। सरकार इस उम्मीद में   है कि  आप ब्लैक मनी छुपा नहीं पाएंगे। और अगर आप ब्लैक मनी नहीं छुपा पाएंगे तो बाद में बहुत तकलीफ आने वाली है। तकलीफ यह कि  भारत की अस्सी प्रतिशत गतिविधि ब्लैक मनी से ही चलती है। सरकार नहीं चलाती इस देश को, यह देश तो ब्लैक मनी से ही चलता है। मेरा इस पर अद्ध्यायाँ है और मैं किसी से भी इस विषय पर बात कर सकता हूँ कि  ब्लैक मनी के बिना यह देश नहीं चल सकता। जैसे इस देश में कुल एक लाख तीस हज़ार मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे, गिरजाघर आदि सब धर्मों के स्थल हैं। इन सबको चलने में ब्लैक मनी ही काम आता है। कोई हिंदुस्तान की सरकार कोई मंदिर चलती है क्या ? हिंदुस्तान की सरकार इतनी हरामखोर है कि  मंदिरों में आने वाली रक़म को भी ले लेती है। जैसे आपको मालूम  है जम्मू कश्मीर में वैष्णो देवी का मन्दिर है। उसकी रक़म को सरकार ने लेना शुरू कर दिया है। पहले यह कहा था कि  मंदिर के विकास के लिए इस्तेमाल होगी, अब धीरे धीरे मंदिर का विकास तो रुक गया है और रक़म जम्मू कश्मीर सरकार के खजाने में जा रही है। यही हाल तिरुपति बालाजी का है। तिरुपति बालाजी की रक़म को तो चंद्रबाबू नायडू ने बहुत बार अपने कर्मचारियों को तन्ख्वाह  देने में खर्च किया।
ऐसे ही दक्षिण भारत में देवायुर मंदिर है केरल में।  उसकी रक़म को केरल सरकार इस्तेमाल करती है। सरकार मंदिरों को देती कुछ नहीं, जो मंदिरों में चढ़ावा  आ रहा है, दान आ रहा है, उस पर भी उनकी गिद्ध नज़र लगी हुई है। और अब सरकार यह बहस चला रही है कि  क्यों नहीं सब मंदिरों की रक़म को लेने का अधिकार सरकार को दे दिया जाये। क्योंकि सरकार को मालूम है कि  मंदिरों में आने वाला पैसा बहुत है। अब मंदिरों में जो दान आता है वह सब ब्लैक मनी है। तो ब्लैक मनी से मंदिर चल रहे हैं। मंदिरों के साथ साधू संतों की व्यवस्था हो रही है। भारत में सरकार के आंकड़ों के अनुसार लगभग डेढ़ करोड़ साधू संत हैं। इनकी पूरी व्यवस्था ब्लैक मनी से चलती है। सरकार किसी संत को तनख्वाह नहीं देती। फिर भी ये संत सरकार के किसी अधिकारी से ज्यादा अच्छी जिंदगी बिताते हैं। कई संतों का रहन सहन अगर आप देखोगे तो पाओगे कि  एयर-कंडिशन्ड  गाड़ियों  की  लाइन लगी हुई है, एयर कंडीशनर में सोते हैं,बढ़िया भोजन खाते हैं,हवाई जहाज़ों में सफ़र करते हैं।साधू संतों का जीवन किसी बड़े अफसर से कम नहीं है।इतना खर्चा जो उनके जीवन में हो रहा है, वह  सब  ब्लैक मनी का है।  ब्लैक मनी से मंदिर चल रहे हैं,मठ चल रहे हैं,पूरी की पूरी धार्मिक व्यवस्था चल रही है।इसी ब्लैक मनी से उन मंदिरों के द्वारा गौशालाएं चलाई जा रही हैं।   उन  मंदिरों के द्वारा धर्मशालाएं चलाई जा रही हैं।   उन मंदिरों के द्वारा अस्पताल  चलाये  जा रहे हैं। उन मंदिरों के द्वारा पानी के कुँए खोदे जा रहे हैं, तालाब बनाये जा रहे हैं, बावड़ियाँ बनाई जा रही हैं। सड़कें बन रही हैं और कई बार तो ग़रीब बहनों के विवाह भी किये जा रहे हैं। हिंदुस्तान की सरकार कब बजट से ग़रीब बेटियों के विवाह के लिए पैसा देती है? कब हिंदुस्तान की सरकार मंदिरों के रख-रखाव के लिए खर्च करती है? कुछ नहीं करती। जबकि मंदिर समाज के बहत से काम करते हैं। तो मंदिरों के माध्यम से समाज की बहुत बड़ी व्यवस्था चल रही है। और हिंदुस्तान में विवाह होते हैं, शादियाँ होती हैं,  होते हैं। सोलह संस्कार कुल होते हैं - इन संस्कारों पर होने वाला खर्च सब ब्लैक मनी का है और इन संस्कारों पर होने वाला खर्च भारत के कारीगरों के लिए बहुत बड़ा बाज़ार बना हुआ है। जैसे हमारे देश में यज्ञ होते हैं, तो यज्ञ में क्या होता है - घी चढ़ता है, घी की आहुति होती है। और दूसरी सामग्री लगती है। तो यज्ञ सामग्री बनाने वालों को तो रोज़गार यज्ञों से ही मिला हुआ है। और घी का बिजनेस करने वालों का ज्यादा घी तो यज्ञ में लगता है - खाने में इतना काम नहीं आता। अगर मान लो यज्ञ होना बंद हो जाएँ, तो सारे पशु-पालक भूखे मर जाएँ जो घी बना कर अपनी जिंदगी चला रहे हैं। किसानों की भूखे मरने की नौबत आ जाये। और ऐसे ही जब यज्ञ होते हैं तो नए कपड़े  खरीद कर उसमे स्वाहा किये जाते हैं, आहुति में डाले जाते हैं। तो कपडा बनाने वाले कारीगरों को रोज़गार मिला हुआ है क्योंकि यज्ञ का नियम है कि  हाथ का बनाया हुआ कपड़ा  ही इस्तेमाल होता है। तो लाखों जुलाहे यज्ञ में दान किये जाने वाले कपडों  के आधार पर अपनी ज़िन्दगी चला रहे हैं। ऐसे ही आपने देखा है की जब यज्ञ होता है तो दस बारह दिन के लिए बाज़ार लग जाता है वहां। जो दानी जनता आती है वह लाखों रुपये का सामन खरीदती है तो वह बाज़ार भी ब्लैक मनी से चलता है। हमारे यहाँ सोलह संस्कार हैं तो आप देखेंगे की इन संस्कारों में किसी न किसी कारीगर के रोज़गार की व्यवस्था संस्कारों के माध्यम से हो रही है। सबसे आखिरी संस्कार - मृत्यु संस्कार की कल्पना करें। तो मृत्यु के समय किसी व्यक्ति को अंतिम यात्रा में क्या क्या लगता है। नया कपड़ा  चाहिए। नया कपडा ही क्यों जबकि घर में पुरानी धोतियाँ बहुत पड़ी होती हैं ? और हाथ का बना ही चाहिए। तो यह तो पक्का है कि  जुलाहे का दो-तीन मीटर कपड़ा तो बिकेगा ही। और हर साल एक करोड़ लोग मर रहे हों तो ढाई तीन  करोड़ मीटर कपड़े की तो पक्की व्यवस्था है। इसी तरह बच्चे के जन्म के समय नए कपड़े चाहियें तो वह भी जुलाहे से ही लेकर आता है। फिर बच्चे के नाम से जो कपड़े  दान दिए जाते हैं वे भी जुलाहे के ही होते हैं। पंडित को दान दिया जाता हैं, औरों को दान दिया जाता है तो पक्की व्यवस्था है। ऐसे ही, व्यक्ति की अंतिम यात्रा में जो घड़ा ले जाते हैं वह भी नया चाहिए। पुराने घड़े से काम क्यों नहीं चला लेते? अगर पुराने घड़े से काम चलाएंगे तो कारीगर का बिकेगा क्या? घड़ा भी बिकता है उसमे, लकड़ी भी बिकती है उसमें तो लकड़ी वाले का भी रोज़गार है। और जो लकड़ी बांधते हैं उसमे, उसके लिए रस्सी और बांस वाले का भी रोज़गार है। अर्थात, हिंदुस्तान में सोलह संस्कारों की जो व्यवस्था है, वह वास्तव में मार्केटिंग सिस्टम है। मार्किट बनाने की व्यवस्था है। अगर विभिन्न संस्कारों में खाली मंत्र पढ़ दिए जाएँ, और कुछ न किया जाये तो भी चल सकता है। न कपडा मंगाओ, न घड़ा मंगाओ, न कुछ करो, बस मंत्र पढ़ दो, तो खाली मंत्र पढने से मार्किट नहीं बनता है। पूजा तो हो जाती है, परन्तु मार्किट तो नहीं बनता है और कारीगर का माल नहीं बिकता है। और भारतीय समाज में यह माना जाता है कि  कारीगर का माल बिकता रहे तो समाज ज़िंदा रहता है। क्योंकि हमारे देश की 35 प्रतिशत आबादी कारीगर वर्ग से है। 70 प्रतिशत आबादी किसान, उसमे से 15% कॉमन है - अर्थात किसान भी है और कारीगर भी है। 20 प्रतिशत केवल कारीगर हैं। तो यह आबादी तब चलेगी अगर उसके द्वारा बने गई चीज़ें बिकती रहें। शादियों में भी ऐसे ही होता है। शादियों में जो संस्कार है, उसमे मंगल सूत्र आना तो आवश्यक है, बिना मंगल सूत्र के शादी नहीं होगी। कम से कम किसी सुनार को तो काम दिया। कारीगर को तो काम मिला। और ऐसे ही, बच्चा पैदा हुआ तो उसके गले में सोने की चेन डालना तो आवश्यक है। तो किसी सुनार को फिर काम मिला। शादी के समय, जन्म के समय, यहाँ तक कि  मृत्यु के समय भी सुनार का कुछ न कुछ लगता है मरने वाले आदमी के साथ। तो सुनार के लिए, लुहार के लिए, कुम्हारों के लिए, जुलाहों के लिए, ये जो हमारे यहाँ 12-13 तरह के कारीगर हैं उनकी व्यवस्था चलती है, वह पूरी की पूरी ब्लैक मनी से चलती है। ये सारे काम ब्लैक मनी से होते हैं। किसी के घर में जन्म दिन का फंक्शन ब्कैक मनी से होता है, किसी की बेटी की शादी ब्लैक मनी से होती है, लड़की की शादी में किस किस को रोज़गार मिलता है - टेंट लगाने वाले को, दरी बिछाने वाले को, फूल लगाने वाले को, खाना खिलाने वाले को, आदि। तो ये जो सामजिक गतिविधियाँ चलती हैं हमारे देश में, ये सरकार तो चला नहीं पाती। सरकार में तो दम भी नहीं है। सरकार में इतना दम नहीं है कि  हिंदुस्तान की बेटियों की शादी करा सके हर साल । उतने में खजाना खाली हो जाए। यह तो समाज की ताक़त है जो हर साल करोड़ों बेटियों की शादी कराता है या करोड़ों बेटों की शादी कराता है। तो शादी हो, विवाह हो, मुंडन हो, संस्कार हो या अंतिम संस्कार हो ये सारी की  सारी  व्यवस्थाएं बाज़ार बनाने के लिए इस देश में हैं। ऐसे ही नहीं है। जो कर्म काण्ड है जिसे कर्मकाण्ड कह कर हम गाली देते हैं, वह मार्केटिंग सिस्टम है। हमने अच्छा मार्केटिंग सिस्टम विकसित किया है अपने देश में। और ऐसा अद्भुत मार्केटिंग सिस्टम दुनिया के किसी देश में नहीं है। तो यह जो मार्केटिंग सिस्टम है, जो सरकार से अलग है, यह पूरा ब्लैक मनी से चलता है। अब सरकार कहती है कि  ब्लैक मनी बिलकुल नहीं रहनी चाहिए, तो यह सब सिस्टम टूट जायेगा। और अगर यह सिस्टम टूट गया तो जितनी भयंकर बेरोज़गारी होगी, उसकी कोई कल्पना नहीं कर सकता। जो आज बेरोज़गारी है उससे भी दस गुना ज्यादा बेरोज़गारी !तो मेरा यह मानना  है की हिंदुस्तान में जो यह ब्लैक मनी की इकॉनमी है वह सरकार से बहुत बड़ी है और सरकार से बहुत ज्यादा अच्छी है। इसका अर्थ है की ब्लैक मनी की इकॉनमी चलनी चाहिए। नहीं चलेगी तो देश ख़त्म हो जायेगा।
अगर इस देश के मंदिर ख़त्म हो गए तो आप सोच नहीं सकते इस देश में इतनी लॉ  एंड आर्डर की समस्या खड़ी  हो जायेगी कि  कोई मिलिट्री, कोई पुलिस उसे हल नहीं कर सकेगी। मंदिरों और मठों ने इस देश के आधे से ज्यादा झगड़ों को अदालत में जाने से रोका हुआ है। मैं अक्सर संतों के पास जाता रहता हूँ, देखता हूँ की दो भाई है, आपस में झगड़ा  कर लिया, आते हैं - महात्मा जी कुछ फैसला कर दीजिये। बाप-बेटे आते हैं की महात्मा जी फैसला कर दीजिये, साधू जी फैसला कर दीजिये। और महात्मा जी जो फैसला करते हैं वे अद्भुत हैं। अगर ये सब मुक़द्दमे अदालतों में चले जाएँ तो अदालतें बैठ जायेंगी क्योंकि हिंदुस्तान की अदालतों में साढ़े चार करोड़ मुकद्दमे पिछले बीसियों साल से पेंडिंग हैं जिनको वो हल नहीं कर पा रही। रोज़ रोज़ वहां मुकद्दमे पहुँचने शुरू हो जाएँ तो वो बैठ जायेंगी - उनके बस का नहीं है। ऐसे ही, ज़्यादातर महात्माजी अदालतें लगाते हैं यानी इनफॉर्मल। फैसले कराते हैं, वह अदालतें लगाना हुआ। और महात्मा बहुतों का इलाज करते हैं। ये जो नुस्खे हैं, सैंकड़ों- हज़ारों की संख्या में, ये महात्मा लोग ही बताते हैं। डाक्टरों के बस का नहीं हैं इस देश में सबको चिकित्सा दिलवाना। भारत में दस लाख रजिस्टर्ड डाक्टर हैं और 103 करोड़ मरीज़ हैं - हिसाब लगा लो डाक्टर पागल हो जायेंगे इलाज करते करते अगर सब मरीज़ डाक्टरों के पास चले जाएँ ! और गाँव के लोग तो महात्मा जी के पास ही जाते हैं, डाक्टर के पास तब जाते हैं जब बात ज़रुरत से ज्यादा बिगड़ जाती और हाथ से निकल जाती है। छोटे मोटे काम के लिए तो महात्मा जी जिंदाबाद है। और महात्मा जी को लोग इसलिए पाले हुए हैं कि  महात्मा जी उनका न्याय कर रहे हैं, चिकित्सा का काम कर रहे हैं, और जब उनके दिमाग में भ्रम पैदा होता है तो महात्मा जी उसका भी निवारण करते हैं। तो बहुत बड़ी व्यवस्था इन महात्माओं के माध्यम से चल रही है। इसमें कुछ अपवाद भी हैं - कुछ महात्मा दूषित हो गए हैं, खराब हो गए हैं - वह तो दुनिया के हर देश में है। कोई व्यवस्था आदर्श नहीं होती। लेकिन समाज को चलाने में इनकी बड़ी भूमिका है। अगर यह ब्लैक मनी ख़त्म हुई तो यह सब व्यवस्था टूटेगी। सरकार के दम में नहीं है इसे चलाना। सरकार में तो इतना दम नहीं है कि  जो इसके निमित्त कर्त्तव्य हैं उनको पूरा कर सके, नई ज़िम्मेदारी लेना तो दूर की बात है। सरकार को 6 लाख 30 हज़ार गावों को पीने का पानी देना है। आज़ादी के सत्तावन साल के बाद भी नहीं दे पाए।अभी तक तीन लाख गावों में ही पीने का पानी है।बिजलीनहीं  दे  पाए  सब  गावों  में, चलने  के  लिए  सड़क  नहीं  बना पाए, स्कूल नहीं खोल पाए हैं,पाठशालानहीं बना पाए हैं,सरकार ये  प्राथमिक  कार्य  तो  कर  भी  नहीं पा रही; यदि  और  नए कार्य  उस  पर  आगये  तो  कैसे  करेगी। ब्लैक मनी से यह जो व्यवस्था चल रही है उसे ख़त्म करने में ताक़त लगाईं तो देश  ख़त्म हो जाएगा। दूसरे  देशों में ऐसा नहीं है। भारत में ऐसा है, दूसरे देशों में नहीं, यूरोप में तो  नहीं वहां न कोई संत होता है, न कोई महात्मा होता है, न कोई मठ में जाता है, गिरजाघर में भी मुश्किल से जाते हैं - साल में एकाध बार। वह भी ऐसे जैसे नाम करने के लिए चले गए। दिल में श्रद्धा है इसलिए जाते हों, वैसा कुछ नहीं। तो वहां की समाज व्यवस्था तो पूरी तरह से सरकार आधारित है। यहाँ की समाज व्यवस्था सरकार आधारित नहीं है। हिंदुस्तान की समाज व्यवस्था स्वयं पर आधारित है और वह चल रही है ब्लैक मनी से। अगर यह ब्लैक मनी ख़त्म हुआ तो यह साड़ी व्यवस्था टूटेगी। कैसे टूटेगी ? व्यापारियों से सरकार ने चूस चूस कर ज्यादा से ज्यादा लेना शुरू किया टैक्स के रूप में तो व्यापारी दान कम देंगे। और वे दान कम देंगे तो मंदिरों में रक़म कम हो जाएगी और मंदिरों के द्वारा जो काम चल रहे हैं देश में वो टूट जायेंगे, बिखर जायेंगे, बंद हो जायेंगे।
पैसा तो उतनाही है - चाहे सरकार खींच  कर ले जाए या व्यापारी समाज के लिए और देश के लिए खर्च कर दे। अगर वह देश, समाज के लिए खर्च करता है तो वह सार्थक है; सरकार को दे दे तो यह गारंटी नहीं है कि  वह उस पैसे  से अपने हार्ट का ऑपरेशन नहीं कराये, सरकार से मतलब नेता। नेताओं में तो इतनी बेशर्मी आ गयी है कि  जनता की मेहनत  की कमाई से अपनी निजी ज़िन्दगी चलाते हैं।  अगर किसी नेता का ब्लड प्रेशर भी हाई हो गया तो जनता के पैसे से हवाई जहाज़ लेता है, अमरीका, रूस तक जाता है और ब्लड प्रेशर चेक करा के वापिस आ जाता है। और ऑपरेशन कराना हो तो लन्दन जाता है। कुछ कराना हो तो सानफ्रंसिस्को चला जाता है। सभी नेता यह करते हैं इस देश में - अपवाद एक भी नहीं है इस समय। और अगर जाना संभव न हो तो विदेशी डाक्टरों को बुला लेता है कि  भई तुम करो मेरा ऑपरेशन, हालांकि देश में डाक्टर मौजूद है, सब कुछ है। तो नेताओं की आदत हो गई है खराब क्योंकि जनता कभी पूछती नहीं है, सीधी सादी, भोली भाली  है। वर्ना इस देश की जनता अगर जूता लेकर खड़ी  हो जाये नेताओं के पीछे की हमने पिछले साल इतना पैसा दिया था टैक्स में – बताओ क्या किया तुमने? और नेता भी  इतने  बेशर्म  हैं  कि  जनता  के पैसों  से  जो  संसद  चलती है  उस संसद का क्या हाल बनाया हुआ है।  रोज़ का संसद पर साढ़े तीन से चार करोड़ रूपया खर्च होता है और जो हालत संसद की है वह आपकी आँखों के सामने है। विधान सभाओं की जो स्थिति है वह आपकी आँखों के सामने है। तो इतनी खराब व्यवस्थाओं में ज्यादा से ज्यादा टैक्स सरकार के पास जाना यह सबसे खतरनाक है। अगर हमारी सरकारें यूरोप जैसे देशों की हों, की भारत की सरकार टैक्स का पैसा इकठ्ठा करती हो और ज़रुरत पड़ने पर वापिस करती हो तब तो ठीक है; या सरकार कम से कम टैक्स लेती हो और ज्यादा से ज्यादा लोगों के पास छोड़ती हो, तब तो ठीक है, लेकिन ज्यादा से ज्यादा टैक्स सरकार लेती जाए और वह इकठ्ठा होता रहे दिल्ली में, या राज्यों की राजधानी में, तो वह देश के लिए बहुत खराब है। इसीलिए VAT  जैसे खतरनाक क़ानून जो नए नए टैक्स के लिए आ रहे हैं, उनका विरोध होना चाहिए। व्यापारी विरोध कर रहे हैं, उद्योगपति विरोध कर रहे हैं वह तो ठीक ही है - जनता को भी विरोध करना चाहिए। क्योंकि यह सार बोझ उनके सिर  पर पड़ेगा। व्यापारी पर टैक्स लगेगा वह जनता से निकाल लेगा। वस्तुओं की कीमत बढ़ा कर जनता से वसूल करेगा, लोग मरेंगे। जो वस्तु  आज एक सवा रुपये की मिल रही है वह VAT  लगने के बाद डेढ़- पौनेदो की हो जाए या ढाई तीन रुपये की हो जाए, तकलीफ़ तो आपको होने वाली है। तो ऐसी स्थिति में, VAT  का क़ानून आया तो GATT  के लिए है, लेकिन उससे भी खराब बात यह है कि  समाज में जो खर्च होने वाला पैसा है, वह कम होता जाय, सरकार के पास और ज्यादा पहुँचता जाए, सरकार और ज्यादा निरंकुश होती  जाए, और अत्याचारी होती जाए और तकलीफ देती जाए इस देश को। चाणक्य यह कहता था की रजा जितना अच्छा हो उतना कम टैक्स; राजा जितना खराब हो उतना अधिक टैक्स। तो उसने एक परिभाषा दी थी कि  भारत के किसी राजा  को उत्पादन के 5 प्रतिशत से ज्यादा टैक्स नहीं लेना चाहिए। अर्थात GDP  का 5%. और आज भारत में VAT  वगैरह के साथ टैक्स GDP  का 25 से 30 प्रतिशत होने जा रहा है। तो यह एक तरह का अत्याचार ही है - अत्याचार क्या, आप पर अधिक टैक्स लग जाना मायने आपकी वास्तविक आय कम हो जाना। आप पर अधिक कर लगते जाना यानी आपके उपभोग के सामान में कटौती होते जाना। जो चीज़ जितनी महंगी होती जाएगी, आप उसका उतना कम उपभोग करेंगे। यानी, अपनी जिंदगी को कष्ट के साथ बिताएंगे और सरकार को पैसा देते जायेंगे। और सरकार यह कैसे करती है - अब तो सरकार ने आटा , दाल, चावल, चना, मटर, चने का आटा आदि सबको VAT  पर डाल  दिया है। इनमे से बहुत सी चीज़ों पर कभी टैक्स नहीं था। दालें इतनी महंगी हैं की हिंदुस्तान का हर आदमी दाल नहीं खा सकता। और VAT  आने के बाद तो यह स्थिति है की केवल थोड़ा  सा ही वर्ग है जो दाल खा सके। बाकी वर्ग तो चावल और नमक से ही अपना गुज़ारा करेगा। साधारण चीज़ों पर भी टैक्स का बढ़ते जाना मतलब उपभोग में कमी आना। अर्थात लोगो का पोषण कम होते जाना और लोगों की कमजोरी बढ़ते जाना। यानी लोगों के काम करने की ताक़त कम होते जाना, उत्पादन कम होते जाना और अंत में नुकसान देश का। आज जब साधारण लोग गाँव गाँव घुमते हैं मेरे जैसे तो किसानों से एक बात सुनने को मिलती है। आपने भी सुना होगा कि  अज्ज्कल मेहनत  नहीं होती ज्यादा। कहते हैं न किसान कि  पहले बहुत मेहनत  कर लेते थे, आजकल नहीं कर पाते। उनका दर्द समझने की कोशिश करिए, उनका खाना पीना बहुत कम हो गया है। जितनी पोषकता का भोजन उनको मिलना चाहिए, वह उनको मिलना मुश्किल हो गया है। साधारण तौर पर देश के 44 करोड़ लोग तो या चावल और नमक खाते हैं या रोटी और नमक व  प्याज खाते हैं। जी हाँ, 44 करोड़ लोग इस देश के। अर्थात उनको जो पोषकता चाहिए दाल की, सब्जी की, दही की, मट्ठे की, सलाद की, वह सब ख़त्म हो गई है। तो मेहनत  करें कैसे? हिम्मत ही नहीं होती मेहनत  करने की। दूध नहीं मिलता, दूध शहरों  में चला जाता है, डेरियों में चला जाता है। वहां उसका पाउडर  बनता है, या उस दूध से आइसक्रीम बन्ने लगती है, चाकलेट बनने  लगती है। साधारण आदमी का पीने का दूध लगातार कम होता जा रहा है। साधारण आदमी की दाल की खपत हर साल कम हो रही है, दही की खपत कम हो गई है, मट्ठे  की खपत कम हो गई है। और हमें जो सरकार दिखाती है कि  दूध का उत्पादन बहुत बढ़ गया है, ऐसा नहीं है। उत्पादन नहीं बढ़ा  है, खपत कम हो गई है। पहले लोग ज्यादा दूध पीते थे, अब पी नहीं पा रहे - क्योंकि खरीद नहीं पाते। इसलिए दूध ज्यादा बच  रहा है तो वह ज्यादा दिख रहा है। वरना आबादी के हिसाब से अगर हर आदमी को 250 ग्राम दूध रोज़ दिया जाए, तो 103 करोड़ की आबादी में एक बूँद दूध  भी भारत में बच  नहीं पायेगा। ऐसे ही दाल की खपत बहुत कम है, और वह इसलिए है कि  महंगाई बढ़ रही है। और महंगाई इतनी बढ़ गई है देखते देखते पिछले सालों में।  तीन सवा तीन रुपये लीटर डीजल था मेरे विद्यार्थी जीवन में। आज उनतीस रुपये लीटर है। सात सवा सात रुपये लीटर वाला पेट्रोल आज पैंतालिस रुपये लीटर है। एक सवा रुपये लीटर का मिटटी का तेल जो मैं खरीदता था, आज दस-ग्यारह रुपये लीटर है। 35-40 रुपये का गैस का सिलिंडर मैंने जो खरीदा है वह आज तीन सौ रुपये का है। दवा इतनी महंगी हैं, हर चीज़ महंगी है क्योंकि टैक्स, टैक्स, और अधिक टैक्स।
और दुर्भाग्य हमारा है कि  दुनिया में सबसे ज्यादा टैक्स देने वाला देश हमारा ही है। अगर आप अमेरिका जाएँ, और यूनिट के अनुसार हिसाब लगायें - यूनिट का मतलब अगर अमेरिका का आदमी एक डॉलर कमाता है तो एक यूनिट मान लीजिये। और, भारत का आदमी एक रूपया कमाता है तो एक यूनिट मान लीजिये। तो अमेरिका में पांच हज़ार यूनिट कमाने वाला आदमी जिस ऐश-ओ-आराम की ज़िन्दगी बिताता है, उतना भारत में पांच हज़ार यूनिट कमाने वाला नहीं बिता सकता। अमेरिका में पांच हज़ार यूनिट कमाने वाला आदमी कार रखता है, मोबाइल रखता है, टेलीविज़न रखता है, रेफ्रीजिरेटर रखता है, सिनेमा जा सकता है महीने में तीन चार बार, कपडे लांड्री में धुलवा सकता है, प्रेस करवा सकता है। अच्छे वेजीटेरियन रेस्टोरेंट में खाना  खा डाकता है, ये सब मज़े कर सकता है और इन्शुरन्स का प्रीमियम भर सकता है। और हिंदुस्तान में पांच हज़ार यूनिट कमाने वाला बच्चों को ठीक से पढ़ा नहीं सकता। पत्नी बीमार पड़  गई तो बिना कर्जे के इलाज नहीं करा सकता। कहीं न कहीं से क़र्ज़ लेकर इलाज कराना पड़ता है। और कहीं कोई आफत आ जाये महीने में तो हाथ पों फूल जाते है कि  कहाँ से व्यवस्था करूं। अमेरिका में क्या है कि  टैक्स का रेट हिंदुस्तान की तुलना में बहुत कम है। और इसका कारण है की जो पेट्रोल हिंदुस्तान में चालीस रुपये लीटर है, वह अमेरिका में सवा ग्यारह रुपये लीटर है। हिंदुस्तान में जो डीजल तीस बत्तीस रुपये लीटर है वह अमेरिका में साढ़े आठ - नौ रुपये लीटर है। हिंदुस्तान में जो गैस का सिलिंडर तीन सौ रुपये का है, वह अमेरिका में चालीस रुपये के आस पास है। यह है डॉलर-रपये का एक्सचेंज रेट लगाने के बाद। हिंदुस्तान से अमेरिका जाना और अमेरिका से हिंदुस्तान वापिस आना जितने में होता है, अमेरिका से हिंदुस्तान आना और हिंदुस्तान से अमेरिका वापिस जाना उससे एक बटा  दस में हो जाता है। तो अमेरिका इतना सस्ता है, इतना सस्ता है कि  जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। कारण क्या है की टैक्सेज बहत कम हैं और अमेरिका से भी कम टैक्स यूरोप में हैं। यूरोप में देश है स्विट्ज़रलैंड। वहाँ एक ही टैक्स है VAT,  बाकी कोई टैक्स नहीं है। और आज स्विट्ज़रलैंड के बारे में लोग कहते हैं कि  वह दुनिया का सबसे अमीर देश है। प्रति व्यक्ति आय में और हर तरह से। कारण क्या है कि  ताज जितना कम है, समाज उतना समृद्धशाली है। टैक्स जितने ज्यादा हैं, समाज उतना भिखारी। तो ज्यादा से ज्यादा टैक्स सरकार लेती जाये, हम भिखारी होते जाएँ, सरकार अमीर होती जाए,तो वह देश के लिए अच्छा नहीं है। हिंदुस्तान में ज्यादा से ज्यादा टैक्स लेने की व्यवस्था अंग्रेजों ने शुरू की थी। दुर्भाग्य से अंग्रेजों के आने से पहले एक ही राजा  था जो सोचता रहता था कि  जनता से ज्यादा से ज्यादा टैक्स लो और वह था औरंगजेब। और कोई राजा  ऐसा नहीं था। औरंगजेब की दिली इच्छा यह रहती थी कि  जनता से ज्यादा से ज्यादा टैक्स लिया जाये। वह नए नए टैक्स लगाने की सोचता रहता था। मुग़ल काल में भी औरंगजेब के मुकाबले में कोई और राजा  ऐसा नहीं हुआ जो ज्यादा से ज्यादा टैक्स लेने के चक्कर में हो। और मुग़ल काल से पहले तो सवाल ही नहीं उठता कि  राजा ने कभी ज्यादा टैक्स लिया हो।
अँगरेज़ आये तो उन्होंने टैक्स लेना शुरू किया। अंग्रेजों ने इतना ज्यादा टैक्स लिया है इस देश से कि  अंग्रेजों के जाने के बाद आज तक अंग्रेजों के जाने के बाद यह देश खड़ा नहीं हो पाया है। कैसे कैसे टैक्स लेते थे अँगरेज़ इस देश में, कैसे कैसे चूसते थे इस देश को, दस पंद्रह मिनट में आपको दिखने के लिए बहुत सेंसिटिव कुछ दस्तावेज़ लाया हूँ कि  कैसे टैक्स सिस्टम थे अंग्रेजों के, कैसे टैक्स वसूला करते थे वे। और उनकी थ्योरी क्या थी - उनकी फिलोसोफी क्या थी? उनकी सबसे बड़ी फिलोसोफी यह थी कि  जनता के पास केवल इतना ही पैसा रहना चाहिए जितने में वह जिंदा रह सके - सिर्फ जिंदा रह सके। एक अंग्रेजी में शब्द होता है - mere  subsistence - अर्थात सिर्फ जिंदा रहने के लायक लोगों के हाथ में पैसा रहे। इतना ही लोगों के पास रहना चाहिए, बाकी सब टैक्स में ले लेना चाहिए। तो उसके लिए उन्होंने सारा  सिस्टम बनाया।
दुर्भाग्य से वह सिस्टम आज तक चल रहा है।आज भी हमारी सरकार यह सोचती है कि  ज्यादा से ज्यादा टैक्स लोगों से ले लो, छोड़ो  मत उनके पास।  इसका मतलब क्क्य? अँगरेज़ तो इसलिए करते थे कि  भारत को कमज़ोर बनाना है, यानी भारत की जनता को कमज़ोर बनाना - कैसे कि  जनता से ज्यादा से ज्यादा टैक्स वसूलो। जनता कमज़ोर होती जाएगी, सरकार मज़बूत होती  जायेगी। तो जनता राज्य कर नहीं पायेगी और जैसे सरकार कहेगी, वैसा करेगी। जितने दिन ग़ुलामी चाहेंगे उतने दिन रहेगी भारत में। इस फिलोसोफी  पर वे काम करते थे। पर अंग्रेजों के जाने के बाद जो भारत में जो ये काले अँगरेज़ आये  हैं - काले अँगरेज़ अर्थात यह मनमोहन सिंह, चिदंबरम, यह अटल बिहारी बाजपेयी, लाल कृष्ण अडवाणी मुरली मनोहर जोशी आदि  जो भी सत्ता में हैं, इन सबको मैं काला  अँगरेज़ कहता हूँ। इनकी हर समय यही कोशिश है कि  ज़्यादा से ज़्यादा  टैक्स लो, ज्यादा से ज़्यादा। जनता के पास कुछ मत छोडो, सब ले लो। जहाँ भी कुछ बचा हो सब ले लो। क्या कांग्रेस, क्या बीजेपी, क्या जनता दल, क्या राष्ट्रीय जनता दल, क्या बसपा, जहां जहां भी सत्ता में हैं,  उन सब की एक ही पालिसी है - जनता के ऊपर ज़्यादा  से ज़्यादा  टैक्स लगाना, ज़्यादा  से ज़्यादा  टैक्स लगाना, और ज्यादा टैक्स लगाना।  यही अंग्रेजों की पालिसी थी कि  ज़्यादा  ज़्यादा  टैक्स लगाना। आज भारत दुनिया के देशों में सबसे दुर्भाग्यशाली देश है जहां per  capita  यानी प्रति व्यक्ति टैक्स सबसे अधिक है। प्रति व्यक्ति टैक्स इस समय भारत में लगभग सात हज़ार आठ सौ साठ  रुपये के आस पास है। अगर इसका  दूसरे देशों की करेंसी में हिसाब लगें तो यह सारी दुनिया में सबसे अधिक है। और सेल टैक्स प्रति व्यक्ति जहाँ दुनिया में सबसे कम है वह देश है स्विट्ज़रलैंड। तो हिसाब लगायें तो जहां सबसे कम टैक्स है, वहाँ  का आदमी सबसे ज़्यादा  अमीर है। और दुनिया में जहां सबसे ज़्यादा टैक्स है, वहाँ  का आदमी सबसे ज़्यादा  ग़रीब है। तो ग़रीबी का सीधा सा हिसाब यह है कि  जितना अधिक आप टैक्स लाएँगे उतना ही ग़रीबी बढ़ेगी। कम टैक्स लेंगे तो उतना ज्यादा पैसा समाज में बचेगा और उतनी ही समृद्धि समाज की बढ़ेगी। तो अगर समाज को समृद्धशाली बनाना है, देश को समृद्धशाली बनाना है तो सरकार को दिया जाने वाला टैक्स कम से कम होना चाहिए। और अगर सरकार को दिया जाने वाला टैक्स अधिक से अधिक है तो समाज ग़रीब होने ही वाला है। वैसे भी टैक्स कम नहीं हैं हमारे यहाँ - जैसा मैंने बताया, direct  और indirect  टैक्स सब मिला कर 43 तरह के टैक्स हैं। अब उसमें 44 वां  VAT  और जुड़ जाये तो तो वह इस देश पर अत्याचार ही है। अंग्रेजों ने कुछ ऐसे ही किया था - मैं आठ दस slides  आपको दिखाता हूँ। पीछे बैठे लोग ज़रा आगे आकर बैठिये, अगर आपको यह समझ में आगया की किस दिशा में देश जा रहा है, तो बहुत अच्छे से समझ में आएगा। इसमें जो slides  हैं, वे अंग्रेजों की संसद से निकाली गयी हैं। अंग्रेजों की संसद से निकाले गए दस्तावेजों के आधार पर बनाई गई हैं। अंग्रेजों की संसद है - हाउस ऑफ़ कॉमन्स। हाउस ऑफ़ कॉमन्स में हिंदुस्तान के बारे में जितने फैसले हुए, उनमें टैक्स के भी फैसले हुए। कब कितना टैक्स लेना है, कितना बढ़ाना है, कितना और बढ़ाना है, तो ये जो टैक्स के फैसले उन्होंने किये उनसे सम्बंधित हैं। हमारे एक गुरु हैं उनका नाम है श्री धर्म पाल, वे चालीस साल इस विषय पर शोध करते रहे कि  अंग्रेजों ने कैसे कैसे इस देश को लूटा, कैसे कैसे बर्बाद किया। इस शोध को करने के लिए जो दस्तावेज़ उन्होंने इकट्ठे किये लन्दन की हाउस ऑफ़ कॉमन्स से, हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स से, उनमे से भी मैं कुछ दस्तावेज़ मैं आपको दिखाना चाहता हूँ। इसमें एक एक डॉक्यूमेंट की एक एक स्लाइड है, मैं आपको पढ़ कर बताऊंगा और आपको इसका अर्थ भी समझाऊंगा।
-next -, next -, -next -, .........हाँ, यह एक डॉक्यूमेंट है इसका नाम है IOR  अर्थात  INDIA OFFICE RECORD; लन्दन के हाउस ऑफ़ कॉमन्स में एक सेक्शन है, जिसका नाम है INDIA OFFICE RECORD जहाँ भारत से सम्बंधित दस्तावेज़ हैं उनमें से यह एक दस्तावेज़ है जिसका नाम है - PRE BRITISH LAND RIGHTS  IN INDIA   अर्थात अंग्रेजों के भारत आने से पहले यहाँ भूमि के अधिकार कैसे होते थे। ज़मीन किसकी मिलकियत होती थी। किसकी संपत्ति होती थी। जब अँगरेज़ आये तो उन्होंने सौ साल तक बहुत तरह के सर्वे कराये;. ईस्ट इंडिया कंपनी का व्यापार जबसे शरू हुआ तब से सन 1757 तक 170 तरह के सर्वे कराये उन्होंने। ऐसा ही एक लैंड सर्वे हुआ था कि  भूमि कितनी है, संपत्ति कितनी है,. अंग्रेजों ने ये सर्वे यह जानने के लिए कि  भारत कैसे चलता है। अगर आपको यह समझ में आ जाये की भारत चलता कैसे है तो उसको तोडना कैसे है, यह आपकी समझ में आ जायेगा। जैसा मैंने बताया की अगर यह समझ में आजाये की वाट कैसे काम करता है तो उसमें से बाहर कैसे निकलना है, यह समझ में आ जायेगा। भारतीय समाज चल कैसे रहा है तो उसे तोडना कैसे है, वह समझ में आ जायेगा। तो यह एक दस्तावेज़ है जो अंग्रेजों की संसद में INDIA OFFICE RECORD में रखा हुआ है। एक अँगरेज़ अधिकारी था जिसने हिंदुस्तान में करीब बीस बाइस साल सर्वे किया गाँव गाँव में घूम कर PRE BRITISH LAND RIGHTS  IN INDIA पर। अंग्रेजों का यह दस्तावेज़ तो बहुत लम्बा है। इसका एक पैराग्राफ बताता है कि  सनातन काल से भारत ही ज़मीन जोतने वालों के हाथ में है। अर्थात जो हल चला रहा है वह ज़मीन का मालिक है। अर्थात किसान इस देश में ज़मीन का मालिक है। मिलकियत किसान की है। इसी रिपोर्ट में वह आगे कहता है कि  कुछ गाँव ऐसे हैं जहां पर किसानों ने अपनी ज़मीन गाँव को दे दी है। सब में नहीं, कुछ गांवों में। क्या करने के लिए? कि  उस ज़मीन पर जो भी उत्पादन होगा वह गाँव के काम आएगा। किसी व्यक्ति के नहीं, गाँव के। अब गाँव के काम कैसे आयेगा ? जो भी ज़मीन गाँव को दी गई है उस पर जो कुछ भी पैदा होगा, उस से  गुरुकुल चलाये जायेंगे, स्कूल चलाये जायेंगे, वैद्यकी का खर्च निकलेगा, जानवरों के लिए घास चारा उस ज़मीन पर पैदा होगा। तो ऐसी कुछ ज़मीनें किसानों ने गांवों में छोड़ राखी हैं। दो दान दी हुई हैं, लेकिन वे ज़मीनें किसानों की हैं, गाँव की नहीं हैं। यह जो कहते हैं कि  ग्राम पंचायत की ज़मीन है, तो ग्राम पंचायत कहाँ से ली उसे ? आसमान में से ? ग्राम पंचायत की कोई ज़मीन नहीं है। ग्राम ने ग्राम पंचायत को दान में दी हुई है। तो उस दिन से कहा जाने लगा कि  यह ग्राम पंचायत की ज़मीन है। ऐसे ही आपने सुना होगा कि  गोचर की ज़मीन है, गोचर की। तो गोचर की ज़मीन कहाँ से आई ? किसानों ने छोड़ दिया जानवरों के लिए। गोचर की ज़मीन हो गई ग्राम पंचायत की। मूल रूप से ज़मीन भारत में किसानों की रही है जो उसे जोतते रहे हैं। यह अँगरेज़ अधिकारी कह रहा है। PRE BRITISH LAND RIGHTS भारत में किसानों के पास हैं। यह ध्यान रखिये, अब आगे, .....next  ........next  ..... हाँ। अब देखिये, यह बात समझ में आई, अंग्रेजों का सर्वे बता रहा है, कि  भारत में ज़मीन सनातन काल से किसानों की रही है। अब अंग्रेजों की संसद में यह रिपोर्ट आ गई। यह रिपोर्ट आई तो इस पर बहस हुई है और यह बहस सन 1812 में हुई है।
1812में लन्दन  की  पार्लिमेंट  में बहस हो  रही  और इस विषय  पर  हो  रही  है कि   क्योंकि  हिंदुस्तान की ज़मीन किसानों की है,उनकी मिलकियत है,तो अब हमें हिन्दुस्तान को तोड़ना  है, और किसानों को बर्बाद करना है, उसके लिए क्या किया जाये? तो इनकी संसद में 1812 में यह प्रस्ताव पारित हुआ कि  यह ज़मीन किसानों से छीन ली जाये, और उनकी मिलकियत ज़मीन पर समाप्त कर दी जाये और किसानों को उन्हीं की ज़मीन पर किरायेदार बना दिया जाये और इसके लिए क़ानून बनाया जाये। तो जब ब्रिटेन में यह बहस हुई और प्रस्ताव पारित हुआ तो उसका शीर्षक है, Indian  peasants   can  establish  no  more  right  on  land than  a  tenant  of  England - अर्थात भारत के किसान का ज़मीन पर, इंग्लैंड के किरायेदार का जो अधिकार है, उससे अधिक अधिकार नहीं है। इंग्लैंड में क्या होता है यह समझ लीजिये ज़रा। जब सनातन काल से भारत में ज़मीन किसान की रही है, उसी समय में इंग्लैंड में ज़मीन राजा की रही है।  सारी  ज़मीन राजा  की है, वह किसानों को ज़मीन खेती करने के लिए देता है और बदले में उनसे हर्जाना लेता है। किस्सान उस पर किरायेदार की हैसियत से काम करते हैं - यह इंग्लैंड की व्यवस्था है। इंग्लैंड में ज़मीन के मालिक बहुत कम लोग होते हैं, और जो होते हैं, उनको लैंडलॉर्ड कहा जाता है- ज़मींदार। वे बहत ही थोड़े हैं, समाज में शायद एक प्रतिशत। भारत में हर व्यक्ति लैंडलार्ड है। तो यह संसद कह रही है इंग्लैंड की कि  भारत में इस तरह की व्यवस्था बने जाये कि कि  भारत इंग्लैंड में जैसे किरायेदार रहता है, वैसी स्थिति में आ जाये। तो यह प्रस्ताव 1812 में पारित हुआ। इस प्रस्ताव के पारित होने के बाद अंग्रेजों ने यह क़ानून बनाया LAND   ACQUISITION ACT . और दुर्भाग्य  से यह क़ानून अंग्रेजों के जाने के बाद भी इस देश में चल रहा है।
यह LAND   ACQUISITION ACT उन्होंने बनाया किसलिए- ज़मीन छीनने के लिए ! और क़ानून बना कर ज़मीन छीनना शुरू किया अंग्रेजों ने।  और जब क़ानून बना कर ज़मीन छीनना शुरू किया अंग्रेजों ने, तभी अंग्रेजों के साथ जगह जगह पर लड़ाइयाँ हुईं। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का जो अंग्रेजों से युद्ध था वह इसी सवाल पर था। उदयपुर के महराना, जोधपुर के राजा, जैसलमेर के राजा  इन सबका जो युद्ध है अंग्रेजों से वह इसी ज़मीन के अधिकार पर है। दक्षिण में, उत्तर में, पूरब में हर जगह अन्ग्रेज़ ज़मीन छीन रहे हैं, और ज़मीन छीनने वाले जो सबसे बड़े अधिकारी रहे हैं उनका नाम था डलहौज़ी। डलहौज़ी ने यह क़ानून बनवाया। और वह यह कह रहा कि  भारत में किसानों को किरायेदार की हैसियत पर ले आओ, उनकी मिलकियत ख़त्म करो  और वे हमारी दया पर काम करें। तो क्या होगा, यह भारतीय समाज पूरा टूट जायगा। तो उन्होंने एक क़ानून बनाकर पूरे समाज की जड़ काट दी। जब से यह LAND   ACQUISITION ACT बना, तब से भारत के किसानों की ज़मीन उनके हाथ से निकल कर सरकार के हाथों में जाने लगी। आज आप जानते हैं, भारत की सबसे ज्यादा ज़मीन भारत सरकार के कब्ज़े में है, जो अंग्रेजों की सरकार देकर गई है। और जगह जगह लिखा रहता है की सरकारी संपत्ति है, अनाधिकृत प्रवेश न करें। वह वास्तव में लोगों की संपत्ति है जो सरकार ने छीन ली है। सरकार क्या आसमान में से ज़मीन बना कर लायी ?  यह लोगों की संपत्ति है। जगह जगह लिखा रहता है न कि  रेलवे की संपत्ति है, इसका दुरुपयोग न करें। रेलवे की कहाँ की ज़मीन है ? सरकार ने छीनी, रेलवे को देदी, रेलवे ने उसपर पटरियां बिछा दीं . पटरियां बिछ गई तो वह संपत्ति रेलवे की हो गयी ? सरकार ने ज़मीन छीनी, सड़क बना दी। सड़क बना दी तो वह संपत्ति सरकार की हो गयी ? तो इस तरह ज़मीनें छीनी गयीं। सबसे पहले, अंग्रेजों ने पता लगा लिया कि  ज़मीन सनातन काल से किसानों की है तो उन्होंने कहा कि  यहीं पर चोट करो। तो किसानों से ज़मीन छीन कर सरकार के हाथ में देना शुरू किया उसी दिन से हिंदुस्तान बर्बाद होना शुरू हुआ। अंग्रेजों से पहले जितने भी मुग़ल राजा आये, उन्होंने किसी ने किसानों की ज़मीन नहीं छीनी।  ज़मीन को जोतने वालों से टैक्स लिया, पर ज़मीन नहीं छीनी। अंग्रेजों ने तो सीधा ज़मीन ही छीन ली इस देश के किसानों से। और एक-दो एकड़ नहीं, लाखों- करोड़ों एकड़। ज़मीन के साथ जंगल सब अंग्रेजों के हो गए। आज जितने भी जंगल हैं, वह सरकार की संपत्ति है। सरकार ने लगाए हैं यह जंगल ? जितनी भी नदियाँ हैं, वह सरकार की संपत्ति है। क्या नदियाँ सरकार ने बनाई हैं हिंदुस्तान में ? जितने भी तालाब हैं वह सरकार की संपत्ति है। क्या तालाब सरकार ने बनाये हैं इस देश में ? जितनी कच्ची सड़कें हैं वह सरकार की संपत्ति हैं। क्या वे कच्ची सड़कें सरकार ने बने हैं ? नहीं, किसानों ने बनाई हैं। तो यह जो सरकारी संपत्ति, सरकारी संपत्ति शब्द इस्तेमाल होता है, यह अंग्रेजों द्वारा बनाये क़ानून का दुष्परिणाम है। और वह क़ानून है LAND   ACQUISITION ACT. अफ़सोस तो इस बात का है की 15 अगस्त 1947 को जब अँगरेज़ चले गए तो यह कानून चला जाना चाहिए था परन्तु यह कानून आज तक इस देश में चल रहा है। और यह कानून इतना Draconian (अर्थात निर्मम) है की सरकार आपकी ज़मीन छीन सकती है, आप कुछ नहीं कर सकते। और अँगरेज़ ऐसी व्यवस्था करके गए हैं कि  आप इस LAND   ACQUISITION ACT को आप हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज नहीं कर सकते। अगर कल को छत्तीसगढ़ की सरकार यह फैसला करे की इस अग्रसेन भवन में दारू का एक कारख़ाना  बनेगा, तो अग्रसेन भवन जिनके हाथ में है, वह उन्हें देना पड़ेगा। पब्लिक इंटरेस्ट में। सरकार दारु का कारख़ाना  बनाएगी, इस भवन को तोड़ कर। आप कितना भी विरोध कीजिये, आपकी बात नहीं सुनी जाएगी। आप अदालत में PIL  (पब्लिक इंटरेस्ट पेटीशन) कर दीजिये, केस हार जायेंगे आप। लैंड   एक्वीजीशन के सभी केस जनता हारती है क्योंकि क़ानून ऐसा बना हुआ है। और सरकार का क्या इंटरेस्ट है दारु के कारखाने में ? दारू बनाने वालों से चुनाव के लिए चन्दा लेने  का सीधा इंटरेस्ट है उनका। उसको और कोई इंटरेस्ट बना देते हैं। जुए का अड्डा, वेश्याघर, लाटरी  घर कुछ भी पब्लिक इंटरेस्ट में बनवाने के नाम पर सरकार कुछ भी आपसे छीन सकती है, और आपको देनी पड़ेगी।  गाँव के गाँव खाली कर दिए जाते हैं। आप सुनते हैं ना कि  फैक्टरियाँ लग रही है, कॉलोनियां बसाई जा रही हैं। अगर आप तैयार न हों फिर भी देना पड़ेगा, विकास के नाम पर। तो अँगरेज़ यही इंतजाम  करके गए हैं कि  विकास वही होता है जो सरकार तय करती है। जो जनता कहे वह विकास नहीं होता। जनता अगर ज़मीन पर गेहूं पैदा करती है, चावल पैदा करती है और देश को खिलाती है, वह विकास नहीं है। चवल, गेहूं बंद करके वहां दारू बनाना शुरू कर दें तो वह विकास हो गया। तो यह परिभाषा शुरू हुई सन 1812 से और अभी तक भी यही कानून चल रहा है। तो जब तक ज़मीन की मिलकियत किसानों को वापिस नहीं की  जाती, तब तक नक्सलवादी आन्दोलन को इस देश में कोई ख़त्म नहीं कर सकता। हर सरकार परेशान है नक्सलवादी, नक्सलवादी; नक्सलवादी यही सवाल उठा रहे हैं। कर्क सिर्फ इतना है कि मैं इस  बात को सभ्य भाषा में कह रहा हूँ, और वे सिर  काट रहे हैं। वे यही कह रहे हैं की अन्फ्रेजों से पहले सारी  ज़मीनें किसानों की थीं, अंग्रेजों के जाने के बाद वे किसानों को वापिस मिलनी चाहियें। वे आज तक वापिस नहीं मिल रही हैं, इसलिए वे आन्दोलन चला रहे हैं। अधिकारियों को मार रहे हैं, काट रहे हैं, पीट रहे हैं।
मैं यहाँ अपनी भाषा में कह रहा हूँ , बात वही है। पर यही अंतर है कि  वे यह दस्तावेज़ नहीं दिखा पाते। लेकिन वे सत्य कह रहे हैं। दस्तावेज़ यह ही है, जिसके आधार पर हिंदुस्तान की ज़मीनें छीनी गयीं। .......next  ........ऐसे ही आगे देखिये। यह डॉक्यूमेंट है - process  of  changing  institutions .1776 में अँगरेज़ फिलिप्स फ्रांसिस था हिंदुस्तान का  एक बड़ा अधिकारी जैसे गवर्नर होते हैं। यह बता रहा है कि  अगर हम किसी देश को जीत लें, तो उसकी सारी  संपत्ति हमारी हो जाती है। 1.22.27
और हमने भारत को जीत लिया, अब भारत की सब संपत्ति हमारी है, हम जैसा चाहें वैसा करें। तो LAND   ACQUISITION ACT को बनाने का जो तर्क है वह फ्रांसिस ने दिया है। अब कल्पना करें - इंग्लैंड का तो यह तर्क है कि  हमने भारत को जीत लिया तो उसकी सब संपत्ति हमारी है। भारत में क्या तर्क है - कि  भारत में भी चक्रवर्ती राजा हुए हैं, जैसे राम भी चक्रवर्ती हुआ, अशोक भी चक्रवर्ती हुआ, हर्षवर्धन भी चक्रवर्ती हुआ, तो भारत में अगर कोई चक्रवर्ती हुआ और उसने कोई राज्य जीत लिया तो उसी राजा को वापिस दे दिया कि तुम्ही चलाओ, हम से ले लो। हमारे यहाँ चक्रवर्ती  राजा भी संपत्ति का अधिकारी नहीं है। वह वापिस उसको संपत्ति दे देता है। बस मुझे चक्रवर्ती मान लो, की चक्रवर्ती तो मैं हूँ, तुम मेरे नीचे हो। बाकी कुछ लेकर नहीं जाता। तो भारत के जो राजा हैं, वे इस तरह के हैं और इंग्लैंड के जो राजा हैं वे सबकुछ छीन लेने वाले हैं। हमारे यहाँ भी थोड़े दिन तानाशाही रही है, लेकिन दोनों में अंतर समझ लेना ज़रूरी है। हमारे यहाँ किसीको जीत लेने के बाद उसे मारता नहीं, उसको ख़त्म करता नहीं, उसकी संपत्ति हड़प करता नहीं, वापिस उसको दे देता है, राज्य करने के लिए। राम ने लंका   जाती। क्या उसको अयोध्या में मिलाया? नहीं न। किसको दे दिया ? विभीषण को। और विभीषण  ने लंका चलाई। हमारे यहाँ यही परम्परा है कि  जीतने के बाद भी अपने में नहीं मिलाना। उनके ही किसीको राजा बना कर बिठाना। और इंग्लैंड में जीत कर सब कुछ छीन लेना, उनके किसी को कुछ नहीं देना। यह ज़मीन और आसमान का अंतर है। next .... यह एक इंटरेस्टिंग डॉक्यूमेंट है, ध्यान से सुनियेगा। 18 वीं शताब्दी के मध्य में अंग्रेजों ने कनारा क्षेत्र अर्थात कर्नाटक के किसानों पर कितना टैक्स लगाया - जितना बीज बोया उसमे जितना चावल हुआ उतना टैक्स देना है।मान लीजिये, एक क्विंटल बीज डाला, चावल हो गया 100 क्विंटल, तो 100 क्विंटल चावल आपको टैक्स में देना है। अँगरेज़ कर्नाटक को कनारा कहते थे क्योंकि उनको कर्नाटक बोलने में दिक्कत आती थी। उसे दो हिस्सों में बांटा हुआ था, नार्थ कनारा और साउथ कनारा। टैक्स इतना भयंकर कि   जो पैदा करो सब टैक्स में दे दो। फिर खाएं क्या? आगे अधिकारी कह रहा है कि तुमको ज़िंदा रहने के लिए जितना चाहिए वह तुम ले लो इस में से। अर्थात तुम मरो नहीं बस इतना ले लो,  बाकी सब हमारा है। next .......next....next.....यह बहुत इंटरेस्टिंग डॉक्यूमेंट है, त्रावनकोर क्षेत्र का है। इसमें लिखा है कि  त्रावनकोर क्षेत्र में अंग्रेजों के आने से पहले कोई राजा कितना टैक्स ले रहा है। कुल उत्पादन के 5%   से अधिक कोई राजा टैक्स नहीं लेता इस क्षेत्र में। अँगरेज़ ने क्या किया है की जितना पैदा हो रहा है, वह सब टैक्स में दे दो। और अंग्रेजों के आने से पहले सिर्फ 5%   टैक्स था। इसके बाद परिणाम क्या हुए हैं कि किसान मरेंगे क्योंकि सब उत्पादन टैक्स में देना पड़ेगा । और उत्पादन ही नहीं होगा क्योंकि सब उत्पादन टैक्स में देने से तो अच्छा है कि  उत्पादन ही न करो! खेती ही न करो - तो किसानों ने खेती ही करना छोड़ दिया। जब किसानों ने खेती करना छोड़ दिया तो वह ज़मीन सैंकड़ों साल बिना खेती के पड़ी रही। और यह ज़मीन ऊसर और बंजर हो गई, जो आज हमारी आँखों के सामने है। अंग्रेजों के आने से पहले इस देश में एक वर्ग इंच भी ऊसर नहीं था - ये अंग्रेजों के रिकॉर्ड हैं। हर ज़मीन पर उपज होती थी। अंग्रेजों ने जब यह कानून बनाया, तब किसानों ने खेती छोडनी शुरू की क्योंकि उत्पादन करने का कोई अर्थ नहीं रह गया। और तभी से किसानों में ग़रीबी, भुखमरी आनी  शुरू हो गई। और इसके परिणाम पचास साल बाद निकले कि  एक करोड़ किसान इस देश में भूख से मर गए। यह हुआ 19 वीं शताब्दी की शुरुआत में। इतनी ज़बरदस्त भुखमरी हुई। अंग्रेजों के ज़माने में जो भी अकाल पड़े,  भुखमरी हुई, वे सब बारिश न होने से नहीं हुए, बारिश तो भरपूर होती थी। भुखमरी इस लिए हुई क्योकि ज़मीनें छोड़ दी किसानों ने, उत्पादन ही नहीं किया - पच्चास, साठ साल, सत्तर साल तक। पच्चास साल के बाद भारत में एक अँगरेज़ अधिकारी आता है  और वह घूम रहा है भारत में। वह एक जज है और अपनी रिपोर्ट में लिख रहा है कि  "Indian  peasants  are  waiting  since  long  for justice ." अर्थात भारत के किसान न्याय के लिए इंतज़ार कर रहे हैं। न्याय क्या कि  कोई दूसरी सरकार आये, उनकी ज़मीनें वापिस दिलाये, उनपर से टैक्स के क़ानून हटाये - इसके इंतज़ार में सालों से बैठे हैं भारत के किसान। यह है एक अग्रेज जज जिसने यह जजमेंट में लिखा है, कनारा क्षेत्र में घूमकर। और वह लिखता है की मैं रोता हूँ खून के आंसू रोता हूँ, भारत के किसानों की यह दुर्दशा देख नहीं पाया। हमारी सरकार ( वह अपनी सरकार को ही गाली दे रहा है इस स्टेटमेंट में) ने टैक्स जो इतना ज्यादा लगाया  हुआ है, वह हटा लिया जाये और उनकी ज़मीनें उन्हें वापिस की जाएँ। next  ...... अब देखिये, यह एक अँगरेज़ अधिकारी है, मैं पढ़कर सुनाता हूँ। "INDIA  BECAME  LAWLESS  FROM  THE  MOMENT SHE  PASSED  UNDER  OUR  GOVERNMENT . " 1773 में यह लार्ड नौर  करके एक अधिकारी है। एक मंत्री रहा है। ब्रिटिश म्यूजियम का जैसा मंत्री होता है वैसा मंत्री रहा है। तो 24-4-1773 को, वह ब्रिटिश पार्लियामेंट को एड्रेस कर रहा है। और वह कह रहा है कि  जिस दिन से भारत हमारे कब्ज़े में आया है, उसी दिन से भारत LAWLESS  अर्थात कानून विहीन हो गया है। जबकि अँगरेज़ कहते रहे हैं कि  हम भारत में LAW  AND  ORDER  MAINTAIN  करने अर्थात कानून व्यवस्था बनाने आये हैं। आपने सुना की अँगरेज़ कहते थे कि  हम LAW  AND  ORDER  MAINTAIN  कर रहे हैं, वाही आजकल के नेता दोहराते हैं कि  हम LAW  AND  ORDER  MAINTAIN  कर रहे हैं, हम LAW  AND  ORDER  MAINTAIN  कर रहे हैं। अँगरेज़ जज अधिकारी कह रहा है कि  जब से भारत हमारे कब्ज़े में आया है, न्याय व्यवस्था ख़त्म हो गई क्योंकि ज़मीने सब छीन लीं और इतना ज्यादा टैक्स लगा दिया, तो बचा क्या ? next .....अब देखिये, बहुत सुन्दर यह डॉक्यूमेंट है, ज़मीन छीन लीं किसानों से, टैक्स भयंकर लगा दिए, अब क्या कर रहे हैं वो, भारत के अनेक राज्यों में वो जा रहे हैं, और उनके राजाओं को यह सूचना भेजते हैं कि  देखो, हम उस दिन आयेंगे, इतना पैसा हमको चाहिये। आप इकठ्ठा करके रखना नहीं तो हम आपके नगर के लोगों को लूटेंगे। यह सब उन्होंने करना शुरू किया, फ़ौज बना कर। जैसे आज होता है कि  टपोरी किस्म के जो गुंडे हैं मुंबई में, भाई इब्राहीम है,  भाई सलीम, छोटा राजन और न जाने क्या क्या है, वे सीधे चिट्ठी भेजते हैं कि  भैया इतना भिजवा दो, नहीं तो उठा लेंगे तुमको, तुम्हारी बीवी को, बच्चों को मारेंगे, पीटेंगे। वैसा ही अँगरेज़ करते थे। चिट्ठियां भेजते हैं की एक हफ्ते के बाद या एक महीने के बाद आयेंगे, तीस करोड़ रुपये रखना तैयार। या तीस करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ रखना, या तीस करोड़ चांदी की मुद्राएँ रखना। अगर नहीं रखा तो आपके लोगों को लूटेंगे। तो यह दस्तावेज़ है "COLLECTED LARGE  SUMS  OF MONEY  IN  LIEU  OF  LOOTING  THE  CITY" अर्थात नगरों को लूटने के बदले में भयंकर धन इकठ्ठा किया अंग्रेजों ने इस देश में। और वह धन सीधे इंग्लैंड गया। और यह एक नहीं ढाई हज़ार अंग्रेजों ने डेढ़ सौ साल तक यही किया इस देश में। जिसे जितना मौका मिला वही लूट कर चला गया, कि  दे दो नहीं तो मैं शहर लूटता हूँ। और लूटने में क्या क्या आता है - कुछ भी। पत्नी को लूट सकते हैं, बेटी को लूट सकते हैं, बच्ची  को लूट सकते हैं, सोना चांदी के साथ ही आपके घर से और कुछ भी लूट कर ले जा सकते हैं। next ........देखिये, जब टीपू सुलतान को अंग्रेजों ने हराया; पहले टीपू सुलतान ने अंग्रेजों को हराया,  पर बाद में टीपू सुल्तान अंग्रेजों से हारा। जब टीपू सुलतान हार गया तो इन्होंने टीपू सुलतान को मरवा दिया जबकि टीपू सुलतान ने अंग्रेजों को हराया, तो उसने किसी को नहीं मरवाया। उसने सबको छोड़ दिया। तो टीपू सुलतान को मरवाने के बाद उसके महल को लूटा अंग्रेजों ने। उसके महल को कितना लूट कर ले गए उसका यह विवरण है। सिर्फ अकेले टीपू सुलतान के महल में से जो संपत्ति लूटी उसका मूल्य था  चार लाख इकहत्तर हज़ार चौदह ब्रिटिश स्टर्लिंग पौंड। आज एक ब्रिटिश स्टर्लिंग पौंड छियासी रुपये का है। उस ज़माने में अकेले टीपू सुलतान के महल में से इतना उन्होंने लूटा है। और यह जो लूट उनहोंने की है उसमे से कमीशन बांधा बाइस हज़ार सात सौ उनत्तीस स्टर्लिंग पौंड, उन अधकारियों के लिए जिन्होंने लूटने में मदद की। शेष जो बचा वह ब्रिटिश पार्लियामेंट को भेज दिया उन्होंने। अर्थात चार लाख पचपन हज़ार पांच सौ इक्क्यासी स्टर्लिंग पौंड। इतना इन्होंने सिर्फ टीपू सुलतान के महल से लूट कर भेजा । पूरे राज्य की बात नहीं हो रही, सिर्फ टीपू सुलतान का महल है। और यह तो नक़द है, काइंड अर्थात वस्तुओं के रूप में जो है उसका कोई हिसाब नहीं। सामान में क्या क्या है - टीपू सुलतान की तलवार जो कि विजय मल्ल्या नाम का आदमी जो दारु का धंधा करता है, वह उसे अभी कुछ दिन पहले नीलामी में बोली बोलकर वापिस लेकर आया है।   कितने की है - उञ्चास हज़ार पौंड की तलवार है। अर्थात 86 से गुणा  कर लो इसे। इस तलवार की खासियत क्या है - उसकी मूठ सोने की है और हीरे जड़े  हुए हैं इसमें। और मैंने विजय मल्ल्या से पूछा कि  ऐसी कितनी तलवारें है?  उसने कहा कि  सैंकड़ों हैं। कभी कभी आप  अखबार पढ़ते होंगे तो कभी कभी लन्दन में उनकी सरकार की एक संस्था है उसने भारत का सामन नीलाम  किया - अर्थात वह सामान  जो अँगरेज़ यहाँ से लूट कर ले गये। अभी थोड़े दिन पहले टीपू सुलतान के खजाने में से लेजाया हुए एक कप और प्लेट नीलाम हुए थे, दैनिक भास्कर में उसकी फोटो भी आई थी।  वह नीलम हुआ साढ़े तीन लाख स्टर्लिंग पौंड में। कप के चारों तरफ हीरे जड़े  हुए हैं और प्लेट के नीचे हीरे लगे हुए हैं। तो आप कल्पना करो कि  जब एक कप प्लेट इतने कीमती हैं तो वह कोहिनूर हीरा, और उस जैसे सैंकड़ों, हज़ारो हीरे जो अब तक उनके खजाने में हैं, उनकी कुल कीमत क्या होगी। यह सब यहाँ से लूट लूट कर ले गए। क्यों? क्योंकि वे मानते हैं की हमने भारत को जीत लिया तो सब कुछ हमारा हो गया। आपको जीत लिया तो आपका सब कुछ हमारा हो गया। यह जो फिलोसोफी  है जीत की यह सबसे खतरनाक है। ऐसे ऐसे इसमें और भी डॉक्यूमेंट हैं। यह 1761 का एक दस्तावेज़ है। बंगाल का एक डिस्ट्रिक्ट है चट्टगांव करके। अभी यह डिस्ट्रिक्ट बंटवारे के बाद बांग्लादेश में चला गया है। वहां का अधिकारी बोल रहा है की जिस ज़मीन का किसानों ने अपने राजाओं को  अधिक से अधिक एक रूपया टैक्स दिया है भारत में, उस ज़मीन पर हमने आते ही पांच रुपया टैक्स कर दिया, अर्थात पांच गुना। जिस ज़मीन पर एक रूपया टैक्स देते थे उस पर पांच रुपये दे रहे हैं। एक झटके में 500% बढ़ोतरी।
next  .... FORMAL  COLLECTION   OF  TAX  FROM  DINAAJPUR ....1.40. दिनाजपुर एक इलाका है बंगाल में, एक ताल्लुका है उसके टैक्स कलेक्शन की बात हो रही है। जिस दिनाजपुर से अधिक से अधिक टैक्स 11 लाख रुपये टैक्स इकट्ठा होता था उसी दिनाजपुर से अंग्रेजों ने 78 लाख रूपया इकट्ठा करना शुरू कर दिया टैक्स के रूप में, अर्थात सात से आठ गुना। अब इतना ज्यादा आपसे लूटा जायेगा तो क्या होने वाला है? समाज तो ख़त्म हो जाएगा। अब इतनी ग़रीबी, इतनी भुखमरी जो हमारे देश में दिखाई देती है, वह इस लूट के कारण है; न कि  किसी दैवी प्रकोप के कारण, न किसी प्राकृतिक आपत्ति के कारण। और यह लूट की सारी  व्यवस्था टैक्स के माध्यम से हुई है, यह हमें ध्यान रखना चाहिए। अर्थात जितना ज्यादा टैक्स लोगे, जनता उतनी ग़रीब होती चली जायेगी। next .....next .....देकिये एक बहुत अच्छा अँगरेज़ अधिकारी है, - बहुत कम ऐसे अधिकारी हुए   हैं। यू कैल करके अधिकारी है वह कह रहा है कि  पहले राजा जो टैक्स लेते थे उसे प्रजा पर ही खर्च कर दिया करते थे, तो लोगों का पैसा लोगों को वापिस मिल जाता था। राजा के पास कुछ नहीं जाता था। कैसे? जैसे हर्षवर्धन के बारे में लिखा है कि  वह पांच साल तक जो टैक्स इकठ्ठा करता था उसे सब कुम्भ के मेले में खर्च कर देता था। कुम्भ के मेले में खर्च करके अपने खजाने को जीरो करता था, और फिर नए सिरे से टैक्स इकठ्ठा करता था, फिर अगले कुम्भ में खर्च करता था। अर्थात लोगों का पैसा लोगों पर ही खर्च करना, यानी, लोगों का पैसा लोगों के पास वापिस आ गया, कुछ गया नहीं उनके पास से। तो यह अँगरेज़ कह रहा है की हमसे पहले जितने भी राजा थे वे लोगों से जितना टैक्स लेते थे वह लोगों पर ही खर्च करते थे। लेकिन इन्होंने क्या किया? सार टैक्स इकठ्ठा करके लन्दन भेजना शुरू कर दिया। तो पैसा इकठ्ठा यहाँ से होता था, खर्च लन्दन पर होता था। इसलिए, लन्दन खुशहाल हुआ, भारत ग़रीब हो गया। next........1774 में बंगाल में अंग्रेजों ने चार गुना टैक्स बढ़ा  दिया। जबसे रोबर्ट क्लाइव  आया, तभी से उसने बंगाल में किसानों पर चार गुना टैक्स कर दिया।
next ...... देखो, यह बहुत सुन्दर स्टेटमेंट है, यह एक  अँगरेज़ अधिकारी का है, जिसका नाम वारन हेस्टिंग आप सब जानते हैं। वारन हेस्टिंग इंग्लैंड की संसद में भाषण दे रहा है। क्या कहता है – “POPULOUS  AND  OPULENT BENGAL BECOMES  IMPOVERISHED  IN  15 YEARS OF BRITISH  CONTROL."अर्थात सबसे अधिक जनसँख्या और समृद्धि वाला राज्य बंगाल 15 साल के ब्रिटिश राज्य में भयंकर ग़रीबी और भुखमरी का शिकार हो गया। वारन हेस्टिंग  ने यह खुद स्वीकार किया कि  अंग्रेजों ने मात्र 15 साल में बंगाल को इतना लूट लिया कि  यह भिखारी और कंगाल हो गया जो थोड़े साल पहले बहुत समृद्धशाली होता था। इतना टैक्स हमने लूटा है ! तो उनहोंने  शाबाशी दी  वारन हेस्टिंग  को। उसको कहा गया की ऐसी स्थायी व्यवस्था करो कि  यह लूट इसी तरह चलती रहे। तो उसने देश में ऐसा बंदोबस्त कर दिया जिसे इतिहास की किताबों में पढ़ते हैं कि वारन हेस्टिंग  बहुत क्रांतिकारी था। वह स्थायी भूमि बंदोबस्त यहाँ करके चला गया। वह यही स्थायी बंदोबस्त था कि  लूट की व्यवस्था बदस्तूर चलती रहे।
next ......देखिये, यह बड़ा महत्त्वपूर्ण डॉक्यूमेंट है, कि  जब वह टैक्स वसूलते थे और कोई टैक्स नहीं देता था तो पेनल्टी  क्या हैं। आपके ऊपर टैक्स लगा दिया, आप नहीं भरें तो दंड कितना है ? तो दंड के ये दस्तावेज़ हैं। आपको पचास कोड़े मारे जाएँ। सबसे कम पचास कोड़े और कोड़े में कीले लगे हुए। साधारण कोड़े नहीं, लोहे की कील लगे हुए ! तो इस दस्तावेज़ में यह कहानी बताई हुई है कि  पांच या छः  कोड़े खाने के बाद आदमी बेहोश हो जाता था। पचास तो पड़ना मुश्किल ही है। बेहोश होने के बाद अँगरेज़ छोड़ते थे, होश में आने के बाद बाकी पैंतालिस कोड़े मारते थे। यह चलता था। अंग्रेजों द्वारा अत्याचार की इन्तहा हुई है इस देश में। एलेग्जेंडर रीड करके एक अँगरेज़ अधकारी है वह बता रहा है भारत उन्होंने जो कोड़े मारे हैं और इसमें जो तकलीफें हुई हैं। next  ........हाँ, देखिये यह अँगरेज़ अधिकारी है, वह अँगरेज़ संसद में कह रहा है। यह थॉमस मुनरो है जो बाद में भारत का गवर्नर बना है। यह बता रहा है कि  इंग्लैंड में किसानों को उत्पादन के 20 प्रतिशत से अधिक टैक्स नहीं दिया जाता। ज़मीन अंग्रेजों के राजा की है, और अँगरेज़ किसान उसपर मजदूरी करता है। तो जो मजदूरी करता है उस किसान को कुल उत्पादन के 20 प्रतिशत से ज्यादा नहीं दिया जाता। और वह कह रहा है की इतना उसके ज़िंदा रहने के लिए पर्याप्त है इसलिए इससे ज्यादा हम नहीं देते उसे। तो भारत में भी उन्होंने इसी तरह के क़ानून बनाये की मजदूरों को केवल इतना ही दिया जाना चाहिए जो उनके ज़िंदा रहने के लिए काफी हो। इसलिए, आज भी हिन्दुस्तान में मजदूर को दिन में साठ , सत्तर रुपये से ज्यादा नहीं मिलता। यह नियम अंग्रेजों के ज़माने से चला आया है। आज हम जो बात करते हैं कि  हिंदुस्तान में मजदूरों को बहुत कम मजदूरी मिलती है, यह नियम 1793 से चला आ रहा है। क्योंकि अंग्रेजों की यह सोच थी की मजदूरों को इससे ज्यादा मिलना ही नहीं चाहिए जितने में वे सिर्फ ज़िंदा रह सकें। तो उनहोंने हिसाब जोड़ लिया - एक मजदूर अगर दिन में 500 रुपये का काम करे, तो उसे सौ रुपये से ज्यादा नहीं मिलना चाहिए। यह था उनका नियम - 20% का। और अगर हज़ार रुपये का काम करे तो दो सौ रुपये से ज्यादा नहीं मिलना चाहिए उसे। उसी की तरह मजदूरी की दरें भारत में तय की गई हैं। और आज भी, उन मजदूरों के द्वारा पैदा किये गए उत्पाद का सपोर्ट प्राइस तय होता है। और इसलिए इस देश का मजदूर और किसान भयंकर ग़रीबी में है। पर यही फार्मूला सर्विस क्लास पर लागू नहीं होता। सर्विस क्लास अर्थात्त बैंक हैं, बीमा कम्पनियाँ हैं, एडमिनिस्ट्रेशन आदि पर लागू नहीं होता। अगर उनपर भी लागू हो जाये, तो दो मिनट में उनको समझ में आ जाये। तो 20 प्रतिशत का फार्मूला मजदूरी करने वाले लोगों पर ही है । और भारत का अस्सी प्रतिशत वर्ग मजदूरी वाला है इसलिए आज भी भयंकर ग़रीबी व भुखमरी का शिकार है। अर्थात मैं कहना यह चाहता हूँ की कितने  भी प्रधान मंत्री बदल लो, अटल बिहारी को ले आओ और उनसे भी अच्छा हो तो उसे ले आओ, यह क़ानून जब तक हिंदुस्तान में चलते रहेंगे , हिंदुस्तान की ग़रीबी दूर नहीं होने वाली। मुफलिसी दूर होने वाली नहीं है। एक पञ्च वर्षीय योजना या पचास पञ्च वर्षीय योजना चलाओ, कुछ नहीं होगा। क्योंकि ग़रीबी और भुखमरी की जड़ में यह है, कोई व्यक्ति नहीं है। हम लोग व्यक्तिओं पर गुस्सा करते हैं। जब नियम कायदे कानून इस तरह के बने हुए हैं अंग्रेजों के ज़माने के तो कोई व्यक्ति क्या करे ? आज भी किसानों की लेबर को अनस्किल्ल्ड कहा जाता है वह इसी आधार पर है। तो जब तक ये कायदे कानून नहीं बदलते और जो खतरनाक कायदे कानून हैं, जो लगाने ल रहे हैं, उनको नहीं रोकते, तब तक हिन्दुस्तान में यही दृश्य दिखने में आएगा।
जैसे मैं छत्तीसगढ़ आता हूँ तो सड़क पर चार बड़े साइन बोर्ड लगे हैं  कि  "ग़रीबी को अलविदा" । छत्तीसगढ़ की सरकार ने लगा रखे हैं -  "ग़रीबी को अलविदा" ? कैसे ? 613 करोड़ रुपया ग़रीबी उन्मूलन योजना के अंतर्गत सरकार इस्तेमाल करने जा रही है। सालों से ग़रीबी उन्मूलन योजना के अंतर्गत छत्तीसगढ़ के आदिवासियों को जो दिया जा रहा है, अगर वह सीधे बाँट दिया जाता, तो एक एक आदिवासी को सोलह लाख रूपया मिल जाता। और हर आदिवासी लखपति हो जाता। तो सरकार ने बोर्ड लगा रखा है कि  ग़रीबी को अलविदा - ग़रीबी उन्मूलन के लिए 613 करोड़ रूपया खर्च करते रहो। व्यवस्थाएं ऐसी चल रही हैं, योजनायें ऐसी चल रही हैं  कि  लाभ किसी को नहीं मिलने वाला। तो किसानों की ग़रीबी तो नहीं दूर होगी, अधिकारीयों की और नेताओं की दूर होगी। यही देश में दस पंचवर्षीय योजनाओं से लगातार  हो रहा है। बार बार कहते हैं न कि  ग़रीबी दूर नहीं हो रही है, ग़रीब दूर होते जा रहे हैं समाज से।
next  ...... देखिये, एक और महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ है आपके बैंकिंग सिस्टम को समझने के लिए। इंग्लैंड से बैंक यहाँ आये। सबसे पहले बैंक ऑफ़ इंग्लैंड यहाँ आया। तो किया क्या उनहोंने ? मद्रास रेजीडेंसी की एक रिपोर्ट है, गवर्नर हावार्ट  लिख रहा है - यूजूरिअल प्रैक्टिसेज के बारे में। यूजूरिअल प्रैक्टिसेज अर्थात ज़बरदस्ती कर्जा देना। कोई लेना नहीं चाहता फिर भी देना। क्यों देना - ताकि ब्याज लिया जाये। और ब्याज देते देते जब वह खाली हो जाए तो उसकी सारी संपत्ति ले ली जाए। यह इन अंग्रेजों ने हिंदुस्तान आकर शुरू किया। इसके लिए बैंक ऑफ़ इंडिया की स्थापना की जो इम्पीरियल बैंक हुआ और आज स्टेट बैंक ऑफ़  इंडिया के नाम से जाना जाता है। तो स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया मूल रूप से अंग्रेजों का बनाया हुआ है। यह बैंक आया किसलिए ? ज़बरदस्ती क़र्ज़ देने के लिए। ताकि आप क़र्ज़ लें, ब्याज बैंकों को दें। ब्याज से ही बैंक चलते हैं। अब भारत में क्या होता था - कोई क़र्ज़ लेता नहीं था। क्योंकि क़र्ज़ लेना यहाँ बहुत तकलीफ की बात मानी जाती है। पुरानी परम्परा हिंदुस्तान में ऐसी है कि  जो करना है, बिना क़र्ज़ के करो। क़र्ज़ लेना है तो बहुत तकलीफ है। हरेक बुज़ुर्ग आपसे यही कहेगा। तो - भारत में क़र्ज़ लेते नहीं थे। ज़बरदस्ती उनको मार के, पीट के उनको क़र्ज़ दिया जाता था। फिर ब्याज की दरें कैसी रखी जाती थी ? जैसे 85प्रतिशत ब्याज, 100 प्रतिशत ब्याज, 90 या 95 प्रतिशत ब्याज। और 40 साल तक तो 100 प्रतिशत  ब्याज ही चलता रहा। ज़बरदस्ती क़र्ज़ दिया जाता था और ब्याज नहीं भरो तो अपनी ज़मीन दे दो हमको, गहने दे दो, संपत्ति दे दो। यह इन्होंने पूरे देश में चलाया। इस तरह से यह बैंकिंग सिस्टम आया। next  ......यह बहुत महत्त्वपूर्ण डॉक्यूमेंट है। इसमें पूरी कहानी है मद्रास प्रेसीडेंसी की। इसमें एक इंटरेस्टिंग कैलकुलेशन है। एक किसान को इन्होंने सौ रुपये क़र्ज़ दिया। फिर उससे चक्रवृद्धि ब्याज अर्थात ब्याज पर ब्याज अर्थात कंपाउंड इंटरेस्ट लेना शुरू किया। चक्रवृद्धि ब्याज अंग्रेजों ने शुरू किया भारत में। इनसे पहले भारत में कभी चक्रवृद्धि ब्याज नहीं होता था। तो इस में कहानी है, जिसे वारन  हेस्टिंग लिख रहा है, कि हमने एक किसान को सौ रूपया उधार  दिया और चक्रवृद्धि ब्याज लगा कर  75,000 रूपये ब्याज में वसूल किये, और अभी भी मूल धन उसपर बाकी है। तो हम बहुत सफल हैं भारत में - ऐसा वह कह रहा है। हम ऐसे ही चलाते जायेंगे तो यह देश हमारे क़ब्ज़े  में ही रहने वाला है। यानी हर तरह से लूटना - टैक्स लगा कर लूटना, ज़बरदस्ती लूटना, क़र्ज़ देकर लूटना, ज़बरदस्ती कर्ज़े देना , कहीं पर भी छोड़ना नहीं आपको। और लूट लूट कर सब इंग्लैंड लेकर जाना। next .....अब देखिये, एक अँगरेज़ अधिकारी विलियम बेन्टिंग  का नाम सुना होगा - वही। जिसके बारे में हमारी पुस्तकों में लिखा है कि  वह क्रांतिकारी था, समाज सेवी था, समाज शोधक था, उसने सती प्रथा का अंत करा दिया।  उसका असली रूप  क्या था यह दस्तावेज़ बताते हैं। विलियम बेन्टिंग  खुद जब 1804 में बंगाल का गवर्नर है, तब वह इंग्लैंड के राजा को एक पत्र लिख रहा है। उसमे लिख रहा है - WE  HAVE  ROLLED  THE  COUNTRY  TOO  HARD  RESULTING  IN  LAMENTING  POVERTY  TOO  HARSH .  अर्थात हमने इस बुरी तरह से इस देश को रौंदा है, लूटा है  कि  जिसका दुष्परिणाम है कि  भयंकर ग़रीबी और भुखमरी में भारत फँस गया है। जिसके बारे में बताया जाता है की वह बड़ा महान था, बड़ा क्रांतिकारी, उसने ऐसी लूट मचाई है, वह खुद कह रहा है। और इतिहास की किताबों में बड़ा फोटो है विलियम बेन्टिंग का और राजा राम मोहन राय  का। वे बड़े भारी दोस्त थे। और हमारे बच्चे यह रटते रहते और यह लिख कर आते और सौ में से नव्वे  नंबर पाते। अभी भी विलियम बेन्टिंग  को वे भूलते नहीं जिसने कहा है कि  हमने इस बुरी तरह से इस देश को रौंदा दिया है  कि  जिसका परिणाम  स्वरुप  भयंकर ग़रीबी और भुखमरी में भारत फँस गया है। next  ......यह इंग्लैंड में 1813 में इस टैक्सेशन  पर बहस हुई है कि  क्या क्या टैक्स लगाये जाएँ भारत पर। ज़मीन पर तो टैक्स लगा दिया कि  जितना उत्पादन कर रहे हो, सब टैक्स में दे  दो। अब इंडस्ट्री अर्थात उद्योग पर कैसे टैक्स लगाये जाएँ ? तो इस पर डिबेट है कि जो व्यक्ति भी भारत में उत्पादन करता है तो एक्साइज ड्यूटी लगाओ, माल बेचता है तो सेल्स टैक्स लगाओ, बेचकर मुनाफा कमाता है तो इनकम टैक्स लगाओ। एक गाँव से दूसरे गाँव लेकर जाता है तो टोल टैक्स लगाओ। हर तरफ से टैक्स लगाते जाओ। किसी चीज़ पर छोडो मत टैक्स। हम जितना टैक्स लेंगे, उतने अमीर बनेंगे और भारत उतना ग़रीब बनेगा।
next ......थॉमस ह्यूगो कह रहा है कई  मुझे सबसे अच्छा यह लगता है कि  ज़बरदस्ती टैक्स वसूल किया जाए। और मुझे इसी काम में लगाये रखो भारत में। और वह कह रहा है की लोगों के मुंह से टैक्स छीन  लेना मुझे बहुत आनंद देता है। मुंह से टैक्स छीन लेना अर्थात रोटी छीन लेना। next ......बैक  रेंटिंग - यह बैक  रेंटिंग  क्या है ? अँगरेज़ राजाओं से उनके घर छीन लेते थे, महल छीन लेते थे और उन्हीं को किराये पर दे देते थे। जैसे आपके घर में अँगरेज़ घुस गए, आपको किरायेदार बना दिया। घर के मालिक वे अँगरेज़। अब आप घर में रहिये और किराया देते रहिये। और किराया कितना ? जिस हिसाब से ब्याज है, वैसे ही किराया। तो घर भी उनका होगया और किराया भी उनको मोल रहा है, इसको बैक  रेंटिंग कहते हैं। अर्थात ज़बरदस्ती किरायेदार बनाकर ज़बरदस्ती किराया वसूलना। तो मालिकों  को किरायेदार बना कर रखना यह उन्होंने किया इस देश में। ज़मींदारों की हवेलियाँ छीन लीं, राजाओं के घर छीन लिए, बड़े किसानों के घर छीन लिए, और उनमे उन्हीं को किरायेदार बना कर रख लिया। तो उन बेचारों के पास जितनी भी संपत्तियां थीं वे किराए में चली गईं सब। next ......फिर एक इंटरेस्टिंग काम उन्होंने क्या किया - जो ज़मीन हमारे देश में किसानों के पास थी, उसे कमर्शियल यूज़ के लिए डिक्लेअर करके, जो अँगरेज़ व्यापारी और उद्योगपति थे, उनके हाथ में दे दिया। और एक ऐसा दलाल तबका था इस देश में जो ज़मीन नहीं रखता था पर ज़मीन की मिलकियत उसकी हो गई। वह दलाल वर्ग आज भी इस देश में है अंग्रेजों के जाने के बाद। जो बड़े बड़े बिल्डर्स हैं वे सब अंग्रेजों की औलाद हैं। इन बिल्डर लोगों के पास ज़मीन कहाँ से आई? अँगरेज़ देकर चले गए। तो वह सनातन बन गया - पीढ़ी दर पीढ़ी,  पीढ़ी दर पीढ़ी। तो किसानों से ज़मीन लेना और कमर्शियल इंटरेस्ट वाले लोगों को देना, यह अंग्रेजों ने किया। इस तरह पूरा समाज छिन्न भिन्न हो गया इस देश का। next ...... अब देखिये, जो मैं थोड़ी देर पहले आपसे कह रहा था, वह स्लाइड दिखा कर दो मिनट में ख़त्म करूंगा। "ONE THIRD OF THE MOST FERTILE LAND HAS GONE OUT OF CULTIVATION IN MADRAS PRESIDENCY DUE TO EXTORTIONATE GOVERNMENT LAND TAX" यह 1854 की रिपोर्ट है। 1854 तक मद्रास प्रेसीडेंसी की एक तिहाई ज़मीन पर लोगों ने भयंकर टैक्स होने के कारण खेती करना छोड़ दिया। और फिर 1910 में आते आते, आधे से ज्यादा ज़मीन छोड़ दी। वही ज़मीन, जिसके बारे में मैंने आपसे थोड़ी देर पहले कहा कि,  आज बंजर है।
लगभग 17 करोड़  हेक्टेयर ज़मीन आज है इस देश में  जो इन्हीं कारणों से,  सालों से बिना खेती  के पड़ी हुई है। ऐसी तो लगभग 50 हज़ार स्लाइड्स हैं, डाक्यूमेंट्स हैं, सब तो मैं नहीं दिखाना चाहता आज,  बस 25-30 स्लाइड दिखाई हैं आपको जिससे आपको ख़याल आ जाये कि  जब बहुत ज्यादा टैक्स लिया जाता है किसी समाज से, तो दुष्परिणाम क्या होता है। इसलिए जो हम VAT  टैक्स का जो विरोध कर रहे हैं, उसका सबसे बड़ा कारण यह है कि  ज़रुरत से ज्यादा टैक्स लेना देश के लिए अच्छा नहीं है, समाज के लिए अच्छा नहीं है। सरकार के लिए हो सकता है, अच्छा हो। इसलिए आज अगर हम इसका विरोध करके रोक लें, तो अच्छा है नहीं तो आने वाले दिनों में इससे भी ज्यादा खतरनाक क़ानून आयेंगे और फिर अंग्रेजियत वापिस आ जाएगी। बस फर्क इतना है कि  पहले गोंरे  अंग्रेजों के द्वारा यह किया गया था, और अब काले अँगरेज़ यह सब करेंगे इस देश में। आप पूछेंगे कि  ये क्या जानबूझ कर कर रहे हैं, समझ बूझ कर कररहे हैं ? आप क्या सोचते हैं कि  मनमोहन सिंह जो इतने बड़े अर्थशास्त्री हैं, इतने समझदार हैं, उनको यह सब नहीं समझ में नहीं आता जो मैंने आपको बताया ? या चिदंबरम जो इतना बड़ा कानून का विशेषज्ञ है, इतना बड़ा वकील है, उसको यह समझ में नहीं आता जो हम समझते हैं। उसको सब समझ में आता है। फिर वे क्यों कर रहे हैं ऐसा ? इसका एक ही जवाब है कि  जहांगीर को भी समझ आता था कि  ये विदेशी आयेंगे तो देश को लूट कर ले जायेंगे, फिर भी जहांगीर ने ईस्ट इंडिया कंपनी को लाइसेंस दिया था। जब उससे पूछा तो उसने कहा कि  इसमें मेरा फायदा था, मुझे टैक्स मिलने वाला था। तो मेरा फायदे होता है, मेरी पार्टी का फायदा है, तो हम यह सब करते जायेंगे। अब इनका फायदा क्या होता है ? अगर VAT  आएगा, तो सारा  का सारा  फायदा होगा विदेशी कंपनियों को। कैसे - कि  उनका उत्पादन और बिक्री एक ही चैनल में होगा। उनके यहाँ वैल्यू एडिशन नहीं होता है। जैसे बाटा  कंपनी है न, माल फैक्ट्री में बनता है और रिटेल की दूकान पर आकर बिकता है। तो बीच में कहीं वैल्यू एडिशन नहीं होता। एक ही कंपनी की फैक्ट्री है, उसी का रिटेल शॉप है। तो बात को वैल्यू एडिशन टैक्स से सबसे ज्यादा लाभ है। और बात मायने विदेशी कम्पनियां। और ज़्यादातर विदेशी कम्पनियां अपनी दुकानें खोलने जा रही हैं इस साल से। तो उनको ही सबसे ज्यादा लाभ है। और उनको लाभ है तो वे नेताओं को चुनाव के लिए चन्दा देने वाली हैं। और नेता उसी चंदे के लिए परेशान हैं। तो इनको ज्य्यद से ज्यादा लाभ पहुँचाओ ताकि हमको ज्यादा से ज्यादा मिले, हमारी पार्टी को मिले। इअ तरह पार्टी इन्हीं के चन्दों  से चलती है। कोई राजनैतिक पार्टी आजकल जनता से चुन्नव के लिए पैसा नहीं लेती। परन्तु फिर भी एक एक पार्टी एक हज़ार से तीन हज़ार करोड़ तक खर्च करती है। यह इन्हीं कंपनियों से लेते हैं। तो कंपनियों का मुनाफा जितना बढेगा, उतना ही इनको चंदा  ज्यादा मिलेगा। तो जो वे कहेंगे, सरकारें वाही करने वाली हैं। इसलिए, जोड़ तोड़ करके VAT  का लाना, कानून बनाना हो रहा है। अब प्रश्न हमारे सामने है कि  या तो हम इसका विरोध करें नहीं तो हमारी वही हालत होने वाली है जो अंग्रेजों ने की थी इस देश में। और गांधीजी कहते थे कि  ग़लत कानून का विरोध कोई समाज नहीं करता है, तो ग़ुलाम होने के लिए लिए हमेशा अभिशप्त रहना पड़ता है। तो आज ग़लत कानून बनने  जा रहे हैं। अगर हम इसका विरोध नहीं करेंगे तो बार बार ऐसी ग़ुलामी  में फंसेंगे। तो हम पूरी ताक़त लगा कर VAT  का विरोध करें। कुल जमा निष्कर्ष यह है कि बहुत खराब कानून है जो यह आ रहा है। अंग्रेजों ने जो ज़बरदस्ती टैक्स वसूले थे, वैसा ही यह है। और हम विरोध करें, व्यापारी विरोध करें, उद्योगपति विरोध करें तो थोड़े दिन में क्या होगा ? सरकार के सामने भयंकर विरोध है तो फिर सरकार की हिम्मत नहीं पड़ेगी। और सरकार इसको वापिस करेगी तो धीरे धीरे दूसरे कानून भी वापिस होंगे। और अगर यह लागू हो गया तो फिर इससे भी ज्यादा खराब कानून आयेंगे। इसलिए हमने पिछले कुछ दिनों से VAT  के विरोध में अभियान चलाया है। उत्तर भारत में काफी सफल रहा कि  उत्तर भारत में VAT  नहीं आया। उत्तर प्रदेश में नहीं है और उत्तर प्रदेश को देख कर फिर तमिलनाडु में नहीं है। और ऐसे बारह राज्यों में नहीं है। बाकी राज्यों में भी यह अभियान चलेगा तो यह वापिस हो सकता है। दुनिया में, जैसा मैंने आपसे कहा, असंभव कुछ नहीं होता। अगर ये सरल सरल सीढ़ी सीढ़ी बातें व्यापारियों को समझ दी जाएँ तो वे ही इतना ज़बरदस्त आन्दोलन कर लेंगे, कि  सरकार को तकलीफ हो जाए। हमने व्यापारियों को बताया तो उन्होंने कहा की अगर आप 1 अप्रैल से पहले आजाते तो हम भी धंधा बंद कर देते। 1 अप्रैल को छत्तीसगढ़ में बंध था, हमने धंधा बंद नहीं किया क्योंकि किसी ने हमको आकर बताया नहीं, समझाया नहीं कि  इसमें हमारा कितना नुक्सान है। उनके बीच मैंने जब व्याख्यान दिया तो उन्होंने कहा यह इतना खराब है, तो हम 1 अप्रैल को सब बंद कर देते, दूसरों को भी करवा देते। अर्थात अदिकंश व्यापारियों को मालूम नहीं है कि  VAT  कितना खराब है। और व्यापारी को छोडिये, जिस ग्राहक पर लगने जा रहा है, उसे नहीं मालूम कि  VAT  कितना खराब है। तो हम ज्यादा से ज्यादा लोगों को बता सकें, उनको समझ सकें, इस दृष्टि से फिर एक अभियान की ज़रुरत है। जैसा कि  मैंने सुबह कहा, की किसानों के लिए, व्यापारियों के लिए, उपभोक्ताओं के लिए अभियान  चलाने की ज़रुरत है। अब इस में क्या है, ये जो मैंने डाक्यूमेंट्स दिखाए, वे सब CD  मैं उपलब्ध हैं। आपको अगर इंटरेस्ट हो तो यह CD  आपको मिल जायेगी। इसके  अलावा एक और CD  हम बना रहे हैं, वह VAT  के ही बारे में है। VAT  का एक एक प्रावधान, जैसा इस में लिखा है VAT  का क्या दुष्परिणाम है, वह उसमे लिख रहे हैं, उसपर किताब भी बन जाएगी। हमें क्या करना है ? उसके आधार पर ज्यादा से ज्यादा लोगों में जागरूकता लानी है - VAT  के विरोध में और GATT  के विरोध में। अगर पूरे  देश में जाग्रति आई, तो किसी सरकार में दम नहीं है। सरकार तभी लाती है किसी चीज़ को, कि  जब लोगों को पता नहीं रहता। और अगर देर हो जाये, तो विरोध करने का आधार नहीं रहता। जब ताज़ा ताज़ा है, और आप विरोध करो तो वापिस लेना पड़ता है। देखिये, हरियाणा में क्या हुआ था, दो साल पहले उन्होंने VAT  लगाया। सबसे पहला मुख्य मंत्री था चौटाला जिसने VAT   लगाया। दो साल में जनता इतनी परेशान हो गयी, व्यापारी इतने हैरान, परेशान हो गए, तो उन्होंने तय कर लिया कि  चौटाला को हराना है। जो चौटाला दो-तिहाई बहुमत से चीफ मिनिस्टर बना था, उसकी यह हालत है कि  उसके पास नौ सीट भी नहीं हैं। अर्थात 10 प्रतिशत सीटें भी नहीं हैं। स्वयं वह हार गया एक जगह से, और दूसरी जगह से खड़ा था वहां बेईमानी करके  1500 वोटों से किसी तरह से जीता। अर्थात जनता ने उसको सबक सिखा  दिया। तो चौटाला जो इतना एग्रेसिव होकर VAT  लाया, वह अभी सड़क पर है। ऐसे ही दिग्विजय सिंह जिसने VAT  का कानून पास किया मध्य प्रदेश में, वह भी सड़क पर है। चन्द्र बाबू नायडू, जिसने VAT  के समर्थन में यात्रा निकाली थी आंध्र प्रदेश में, वह भी हार गया। यानी, जनता ने हर उस नेता को हराया है जो VAT  के समर्थन में है। तो आप क्या करें? आप बस इतना करें कि  मुख्या मंत्री को पचास पैसे का पोस्ट कार्ड लिखें कि  आप छत्तीसगढ़ में VAT  न लायें, और अगर लायें तो चौटाला का ध्यान रखें, चन्द्र बाबू नायडू का ध्यान रखें। मैंने जहां जहां भी कहा वहां कार्ड लिखना चालू  भी हो गया। आप भी लिखिए। पचास पैसे का पोस्ट कार्ड मुख्या मंत्री को लिखिए कि  हम VAT  नहीं चाहते, और अगर लाये तो चौटाला का ध्यान रहिये। हरेक मुख्या मंत्री को एक ही चीज़ से डर  लगता है - कुर्सी जाने से। सत्ता जाने से। बाकी किसी चीज़ से  नहीं। तो अगर रायपुर में 10-15 हज़ार चिट्ठी पहुँच जाएँ तो इतना पता चल जाएगा कि  छत्तीसगढ़ की जनता VAT  नहीं चाहती। उत्तर प्रदेश का मुख्य मंत्री, मुलायम सिंह  तो गुंडा है बिलकुल, और उसने तो कह दिया था की मैं तो VAT  लागू करके मानूंगा। और उसका VAT  लागू करने का जो हिसाब सोचा था वह दूसरा था। उसने सोचा, कि  मैं VAT  लागू करूंगा तो सोनिया गाँधी खुश हो जायेगी - क्योंकि सोनिया गाँधी इसे दिल्ली से लागू  करवा रही है। तो सोनिया गाँधी खुश हो जायेगी ओर मेरी सरकार चलती रहेगी। कांग्रेस मुझे उत्तर प्रदेश में तकलीफ नहीं करेगी। आज उत्तर प्रदेश में इतना विरोध हो गया की मुलायम सिंह  को कहना पड़ा कि  जब तक व्यापारी हाँ नहीं कहेंगे, तब तक मैं VAT  नहीं लाऊंगा। और मुलायम सिंह ने कहा तो फिर मायावती जो विरोधी पक्ष में है, उसने भी कहा कि  मेरी भी सरकार आएगी तो VAT  नहीं लाएगी, VAT  तभी आएगा जब व्यापारी हाँ कहेंगे। तो यही अगर पूरे देश में हो जाए तो अच्छा है। और व्यापारी हाँ किसपर करें ? व्यापारियों को कहना चाहिए कि  सारे indirect  टैक्स ख़त्म करो फिर VAT  लाओ। और अधिकतम टैक्स की दर 6% करो और सिंगल पॉइंट टैक्स करो। ये तीन मांगें रखो फिर देश में बहुत अच्छा हो जाएगा। सारे indirect  टैक्स ख़त्म हो जाएँ तो जो वस्तु आज जिस मूल्य पर मिल रही है, उससे आधे दाम पर मिलेगी। दस रुपये की चीज़ पांच रुपये में, पांच की ढाई रुपये में, और दो रुपये वाली एक रुपये में। आज कुल टैक्स हिंदुस्तान में 64% के आसपास बैठता है। अगर हम इसको ख़त्म करा दें और सिंगल पॉइंट VAT  करा दें , तो बहुत सस्ती हो जायेंगी चीज़ें। और महंगाई कम हुई तो ग़रीब से ग़रीब आदमी भी आसानी से ज़िंदा रह सकेगा। तो यह एक अच्छा मौका है जब हम पूरे देश में यह बहस चला सकते हैं। और यह बहस चलाने में आप सब लोग कुछ न कुछ योगदान दे सकते हैं। इतना ही करें कि  सबको यह बताएं। सिंगल पॉइंट टैक्स होना चाहिए, अधिक से अधिक टैक्स की दर 6% होनी चाहिए और सारे indirect  टैक्स ख़त्म होने चाहियें। याक एक ही टैक्स होना चाहिए, VAT . और एक काम और कर सकें तो करिए कि  टैक्स देने वाले व्यापारी का पूरा टैक्स इकठ्ठा होना  चाहिए  कस्टोडियन के रूप में; सरकार इसकी ज़िम्मेदारी ले। सरकार मालिक न हो उसकी। व्यापारी पर कोई मुसीबत आये तो सारा  का सारा  टैक्स उसे वापिस मिले, ताकि वह नया व्यापार शुरू कर सके। जो सभी यूरोप के देशों में है, वह यहाँ भी होना चाहिए। तो फिर आप देखिये, यह देश सोने की चिड़िया हो सकता है, सिर्फ इतना परिवर्तन होने से। इतना होगा की सरकार के पास टैक्स कम जाएगा; और वह अच्छा ही है। समाज में पैसा ज्यादा रहना चाहिए, और सरकार के पास कम रहना चाहिए। सरकार के पास जितना कम पैसा जाए, समाज के लिए उतना अच्छा है। जैसा आप बैंक में जमा करते हैं तो वैसे ही आपके टैक्स का पैसा जमा हो कि  ज़रुरत पड़े तो आप निकाल सकें। सरकार आपके जमा पैसे को इस्तेमाल करे और उस पर ब्याज दे आपको। यह इन्शुरन्स की तरह है। सरकार जब कस्टोडियन है तो उस पैसे का इस्तेमाल करती है, देश के विकास में। आप ने जो पैसा जमा  कर दिया, सरकार उसको लेगी, और उस पर आपको ब्याज देगी। जब आपको ज़रुरत पड़े, पूरा पैसा आपको वापिस मिल जाएगा; इस तरह से इस्तेमाल किया जाता है। अर्थात सरकार टैक्स की मालिक नहीं है, मूल बात यह है। मालिक वही है, जो दे रहा है। उसने सरकार को रखने के लिए दिया है ताकि सरकार इस्तेमाल कर सके। इस पर बहुत बड़ा आन्दोलन हो सकता है देश में। सारा व्यापारी वर्ग आपके साथ आ सकता है। पूरा समाज आपके साथ आ सकता है।छत्तीसगढ़ में आप अगर विरोध  करेंगे  तो  VAT  लागू नहीं होगा।
किसीको कोई प्रश्न पूछना हो तो पूछिए।
प्रश्न .......
इनका एक प्रश्न है 1947 में एक रूपया एक डॉलर था। आज एक डॉलर में लगभग 44 रुपये हैं। यह कैसे हुआ ? 15 अगस्त 1947 को भारत क़र्ज़ मुक्त देश था। देश पर  एक पैसे का भी क़र्ज़ नहीं था। तो जब किसी देश पर क़र्ज़ नहीं होता तो उसकी करेंसी की कीमत सबसे ज्यादा होती है। फिर हमने क़र्ज़ लेना शुरू किया 1952 में, 1957 में, 1962 में। तो क़र्ज़ बढ़ते बढ़ता आज इतना हो गया है की क़र्ज़ का ब्याज भरने के लिए आज क़र्ज़ लेना पड़ता है। तो इस क़र्ज़ के चक्कर में हमारी करेंसी की कीमत गिर गयी; और आज हमारा 44 रूपया एक डॉलर हो गया है। अगर हमने क़र्ज़ नहीं लिया होता तो आज भी एक रूपया एक डॉलर होता। और अगर एक रूपया एक डॉलर होता तो क्या होता ? तो पेट्रो हिन्दुअतन में 70 पैसे लीटर होता। डीजल 35 पैसे लीटर होता। रसोई गैस का सिलिंडर 10-12 रुपये में मिलता। अमेरिका जाना और वापिस आना 300 रुपये में हो जाता। पूरे भारत का चक्कर लगाना हो तो ज्यादा से ज्यादा 100-125 रूपया खर्च होता। इंजीनियरिंग पढने के लिए मुश्किल से पांच सौ रुपये का खर्चा होता। डॉक्टर बन्ने के लिए 700-800 का खर्चा होता। आप सोच सकते हैं, यह सब होता अगर हमने क़र्ज़ नहीं लिया होता।
प्रश्न .................
इनका यह प्रश्न है की जब 15 अगस्त 1947 को भारत अंग्रेजों से आज़ाद हो गया तो ये क़ानून रद्द कर देने चाहियें थे, वही नहीं किया इन्होंने। अंग्रेजों का बनाया हुआ एक भी कानून भारत में  आज  तक  रद्द  नहीं  हुआ। गांधीजी इसी पर नाराज़ थे। गांधीजी कहते थे कि  अंग्रेजों को भारत में रहना है तो रहें, लेकिन अंग्रेजियत समाप्त होनी चाहिए।  अंग्रेजियत का मतलब कई2 यह कानून व्यवस्था जो अंग्रेजों की बनाई हुई है। लेकिन इन्होंने क्या किया कि  गांधीजी को मार दिया, अंग्रेजों को भगा दिया और अंग्रेजियत को रख लिया।
प्रश्न .................
एकजुटता आएगी अगर हम कोई एक काम ऐसा करें जो सब करें। कोई एक काम हम तय करें। जो आप भी करें, मैं भी करूं, मजदूर भी करे, किसान भी करें, सब करें। तो एक काम कोई तय कर लें; माना की जैसे VAT  का विरोध है, यह सब करें तो एकजुटता आ जायेगी। या WTO  का विरोध सब करें तो एकजुटता आ जायेगी। भारत में एकजुटता जो आती है, वह काम के आधार पर आती है। जैसे आजादी की  लड़ाई थी। बहुत सारे क्रांतिकारी थे बहुत सारे संगठन थे। लेकिन सब एक जुट थे कि आजादी चाहिए - अँगरेज़ हमें नहीं चाहिए। तो उसमें नर्म दल भी था, गर्म दल भी था, मध्यमार्गी भी थे। पर अंत में एक चीज़ पर सहमत थे की अँगरेज़ नहीं चाहिए। तो अँगरेज़ चले गए। इसी तरह बहुत सारी संस्थाएं इस बात पर एकजुट हो जाएँ कि  VAT  नहीं चाहिये, या GATT  नहीं चाहिए, या WTO  नहीं चाहिए, तो एकजुटता आ जायेगी।
प्रश्न .................
हाँ, सरकार को करना चाहिए,  अगर हम और आप जैसे लोग दबाव डालेंगे, तो।
 प्रश्न .................
इनका यह सुझाव है कि  ज्ञान नहीं है लोगों को, जानकारी का अभाव है। अगर जानकारी लोगों को ज्यादा से ज्यादा हो जाए, तो यह हो सकता है। अब इसका रास्ता  रास्ता इन्होंने बताया कि  TV  चैनल पर यह बताया जाए। एक  TV  CHANNEL  शुरू करें । हम गंभीरता से सोचें की एक TV CHANNEL  शुरू किया जाये इस काम के लिए । ठीक है। इसमें बहुत अधिक रूपया तो नहीं चाहिए,  डेढ़ करोड़ रुपया  लगता  है और हर साल दस लाख रुपये का खर्चा  होता है। और दूसरे रास्ते हैं - बहुत सारी  स्वदेशी कंपनियों से विज्ञापन लिए जा सकते हैं। एक और रास्ता है कि  हर किसान से एक एक रूपया लें, तो दस लाख किसान दस लाख रूपया इकठ्ठा करके दें तो चैनल चलता रहे। 2.24
प्रश्न .................
अभी तो यह जो स्विस बैंक का है न इसमें यह भी जोड़ दिया जाये कि  अँगरेज़ जो जितना लूट कर ले गए वह भी वापस लाया जाये। और अंग्रेजों से पहले फ्रांसीसियों ने और पुर्तगालियों ने  जो धन लूटा, वह भी इसमें जोड़ दिया जाए तो यह धन बहुत है।
 प्रश्न .................
यह प्रश्न बहुत महत्त्वपूर्ण है। इनका यह कहना है कि  छत्तीसगढ़ की ज़मीन की कीमत बहुत कम है, हरियाणा से कुछ लोग यहाँ आते हैं और सैंकड़ों एकड़ ज़मीन एक साथ खरीद रहे हैं। तो यहाँ के किसानों का क्या होगा? अभी तक तो यह समस्या हरियाणा से है। अगले साल से तो विदेशी कम्पनियां यहाँ छत्तीसगढ़ में आकर ज़मीन खरीदने वाली हैं क्योंकि छत्तीसगढ़ में जो लैंड सीलिंग एक्ट है, वह ख़त्म होने जा रहा है। सभी राज्यों के लैंड सीलिंग एक्ट ख़त्म होने जा रहे हैं। पहले क्या होता था कि  लैंड सीलिंग एक्ट के चलते, शहर वाला गाँव की ज़मीन एक सीमा से अधिक नहीं खरीद सकता था। अब सरकारों ने लैंड सीलिंग के क़ानून ख़त्म करने शुरू कर दिए हैं। और अगले साल से तो विदेशी कंपनियों को अधिकार मिलने वाला है कि  वे जितनी चाहें ज़मीन खरीद सकें। इसलिए इस पर तो बहुत गंभीर जागरूकता और आन्दोलन की ज़रुरत है। तो यह सिर्फ हरियाणा का सवाल नहीं है, छत्तीसगढ़ के किसानों की ज़मीन विदेशियों के हाथ में भी जा सकती है। हरियाणा वाले तो फिर भी अपने देशके ही नागरिक हैं, पर अगर विदेशी आकर ज़मीनों पर कब्ज़ा कर लेंगे तब क्या होगा?
प्रश्न .................
इसलिए, पूरे छत्तीसगढ़ में इन विषयों पर जाग्रति होनी चाहिए। और मैं तो साल में एक बार आता हूँ, आप जैसे लोग अगर इन विषयों का अध्ययन कर लें तो पूरे साल छत्तीसगढ़ में घूम सकते हैं और जनता को जागरूक करा सकते हैं। और हमीं करेंगे तो होगा, कोई बाहर वाला आकर नहीं करेगा। जो छत्तीसगढ़ में रहता है, और जिसे छत्तीसगढ़ से प्रेम है, वही  यह सब करेगा। इस वर्कशॉप में आपको बुलाने के पीछे उद्देश्य यही है कि  आप तैयार हों। और जैसे मैं आपको समझा  रहा हूँ, वैसे गाँव गाँव जाकर आप सबको समझा सकें। अब आप अगर कहें कि  ये दस्तासज़ हमें दे दो, तो मैं दे सकता हूँ। इस पर कोई कॉपी राइट नहीं है, इसे CD पर डाल  कर मैं आपको मैं देदेता हूँ। आप गोग गाँव में जाइये और सबको समझाइये। इसका हिंदी करना हो, तो वह भी करवा दूंगा, वह भी हो जाएगा, बड़ी बात नहीं है। लेकिन हम इस काम को करने का संकल्प करें, किसानों से बात करें, और जब यह जाग्रति होगी तो संगठन बनेगा और उस ताक़त से आप कर पायेंगे।
 प्रश्न .................
लैंड सीलिंग एक्ट का जो प्रस्ताव विधान सभा में आया हुआ है, उसे विधान सभा से निकलवा लो। और यहाँ छत्तीसगढ़ का पब्लिकेशन डिवीज़न होगा, वहां से सब पता चल जाएगा।
प्रश्न .................
अभी तो हर सूचना आपका मौलिक अधिकार है। अब तो कोई सूचना वे छुपा नहीं सकते आपसे। सूचना के अधिकार के लिए, कुछ फीस जमा करनी पड़ती है, सब एक्ट और प्रस्तावों की प्रति मिल सकती है।
प्रश्न .................
हिन्द स्वराज अभियान का अर्थ है कि  जो हिंदुस्तान में अंग्रेजों के समय से चली आ रही कानून व्यवस्था है, वह बदलना और जो नै ग़ुलामी  आई है VAT  की, WTO  की, GATT   की, उसको  हटाना। इन सबके लिए जो अभियान है उसका नाम है हिन्द स्वराज अभियान। और इसको हम शुरू करने जा रहे हैं। अभी तक तो जन नातियों तक  था। उससे जन जातियों के कुछ कार्यकर्ता तैयार हो गए हैं। उन कार्यकर्ताओं की मदद से हिन्द स्वराज अभियान शुरू कर रहे हैं। जैसे कि  गाँधी जी ने किया था। और ये अंग्रेजियत के सब कानून बदलने हैं। और VAT की जो नई गुलामी आ रही है, इसको रद्द करवाना है। इसके लिए प्रेरणा दें।
प्रश्न .................
हाँ, यही वजह है। जब यह अभियान चलेगा, बहुत व्यापक होगा, इसमें बहुत सारे दूसरे संगठन जुड़ेंगे, बहुत सारे कार्यकर्ता आयेंगे तो थोड़े दिन के बाद यही बल पकड़ जायेगा। जैसे, आपने देखा कि  कांग्रेस नाम की एक संस्था थी उसने आजादी आन्दोलन चलाया। लेकिन जैसे जैसे आजादी का आन्दोलन बढ़ता गया, कांग्रेस छोटी होती गई और एक दिन आजादी का आन्दोलन बहुत बड़ा हो गया। कांग्रेस बस एक छोटी सी संस्था भर रह गई। वैसे ही जब यह हिन्द स्वराज अभियान एक बड़ा अभियान बनेगा, इसमें बहुत से संगठन शामिल ही जायेंगे। जैसा महा व्यापार संगठन है, और दूसरे संगठन हैं, तो जब ये सब संगठन इसमें आजायेंगे, तो यह संगठन बड़ा हो जाएगा। इसलिए यह हिन्द स्वराज अभियान शुरू हुआ है। संगठन मिलकर इसे चलाएंगे। अभी तो तुम्हारे यहाँ जो सुनार हैं, उनके ऊपर आफत आने वाली है, भयंकर। आपने हॉल मार्क का नाम सुना है? अब सुनारों को अपने हर गहने पर हॉल मार्क लगाना  अनिवार्य होगा। और हॉल मार्क के लिए 20000 रुपये रजिस्ट्रेशन फीस है। 350 रुपये प्रति गहना अलग से फीस है। चाहे छोटा सुनार हो या बड़ा सुनार हो। और जितने गहने आप बेच रहे हैं, उनका 50% हॉल मार्क होना ही चाहिए, नहीं तो आपकी दूकान का लाइसेंस रद्द। आपके खिलाफ ज़ब्ती का वारंट !जैसे VAT  का है, उससे भी ज्यादा खतरनाक है यह हॉल मार्क। एक एक करके ऐसे खराब खराब कानून आने जा रहे हैं, इस देश में। हॉल मार्क होने की संभावना इसी साल में है। यह पूरे देश में होगा। और हॉल मार्क देने वाली अभी तक इस देश में सिर्फ दो ही संस्थाएं हैं। इस देश में एक करोड़ कारीगर हैं। मैंने हिसाब लगाया कि  अगर ये संस्थाएं रोज़ 12 घंटे काम करें, और रोज़ 12 घंटे में सौ कारीगरों को रजिस्ट्रेशन मिले तो एक करोड़ को इतने साल लग जायेंगे कि  तब तक हिंदुस्तान कितनी बार हॉल मार्क की प्रताड़ना झेल चुका होगा। तो यह मुश्किल है। इसका सुनारों ने विरोध करना शुरू किया है। नागपुर में सुनारों की एक बड़ी सभा हुई थी। पूना में हुई थी। फिर अभी दिल्ली में हुई थी, क्योंकि उनको मालूम हो गया है, छोटों को अभी मालूम नहीं है।
 प्रश्न .................
हाँ, होगा। और इसका सारा  पैसा तो विदेशियों के हाथ में जाएगा। आप जो 20000रुपये रजिस्ट्रेशन का देंगे वह उस संस्था के पास जाएगा, जो सर्टिफिकेट देगी और वे सब विदेशी संस्था हैं। और एक करोड़ सुनारों से बीस बीस हज़ार रूपया लिया तो कितना हुआ ? 20000 करोड़ रुपये ऐसे ही लूटकर ले जायेंगे। और हॉल मार्क ऐसे ही है जैसे ISO 9000 सर्टिफिकेट होता है न, ऐसे ही है।
 प्रश्न .................
यह हॉल मार्क की किताब अब आ गयी है। इसपर कैसेट भी है। एक कैसेट मैंने बनाई है, वह सुनारों को सुनाओ, संघ को इकठ्ठा करो इस विषय में, अब जैसे जैसे सबको मार लगेगी तो सब इकठ्ठा होंगे। जब सबके ऊपर आफत आती है तो इकट्ठे होते ही हैं न। आग लगती है तो पूरा मोहल्ला इकठ्ठा होता है कि  नहीं? वैसे सब अपने अपने घरों में सोते हैं। आग लग जाए तो सब इकट्ठे होते हैं, वैसे ही अब होगा।
प्रश्न .................
यह सब बहुत जटिल विषय है। नीरस विषय है। आधे घंटे में फिर इकट्ठे होंगे।
प्रश्न .................
मेरे चुनाव लड़ने की क्या ज़रुरत है? लोग इसे समझें चुनाव लड़कर लोकसभा, विधान सभा में जाएँ और जाकर बदलें। मैं यह चाहता हूँ की यह सब समझने वाले 350-400 लोग पूरे देश में तैयार हो। वे चुनाव लड़ें।
 प्रश्न .................
मेधा पाटेकर चुनाव नहीं लड़ीं। उसमे उसने क्या किया की पूरे मन से नहीं किया, आधे, अधूरे मन से किया। मेरी यह कोशिश है कि  2009 में अगर चुनाव होता है, तो यह सब समझ रखने वाले तीन चार से लोग संसद में जाएँ। इन विषयों पर चुनाव लडें। और वहां जाकर यह सब बदलें।
 प्रश्न .................
आप जो टैक्स भरते हैं छत्तीसगढ़ सरकार को, वह 15 से 20 प्रतिशत है। बाकी सब चंदे का है, अनुदान का है। चाहे केंद्र सरकार से, चाहे विश्व बैंक से, आदि।
 प्रश्न .................
अभी नया राज्य बना उत्तराँचल, उसने भी पहले ही साल से लेना शुरू कर दिया।
प्रश्न .................
मंत्रियों पर दबाव तो बहुत थोडा है, स्वार्थ ज्यादा है। और अधिकारीयों का दबाव होता है। दबाव अधिकारी डालते है, स्वार्थ इनका होता है।
प्रश्न .................
अभी TV  चैनल पर अपने देखा होगा, उत्तर प्रदेश का चीफ सेक्रेटरी है अखंड प्रताप सिंह। उसकी कहानी आई थी, आज तक पर। उस चीफ सेक्रेटरी का वेतन 24000 रुपये है। और उसकी लगभग 350 करोड़ की संपत्ति है।
 प्रश्न .................
ऐसा काम करने से अच्छा है की इनकम टैक्स ही हटवा दें। कुछ छिपाने की ज़रुरत ही नहीं पड़ेगी। जिसके पास जितना है वह या तो झार्च करे या बचाए। तो बजाये  हम बैंक खोलने के इनकम टैक्स ख़त्म कराएं।
प्रश्न .................
उसमे क्या होगा कि  बैंक में पैसा इकठ्ठा हो जाएगा और उसमें भ्रष्टाचार होगा। जहां पैसा एक जगह इकठ्ठा होता है, उसमें भ्रष्टाचार होता है। तो सबके पास रहे अपना अपना ब्लैक मनी और सब अपना अपना खर्च करें - कोई मंदिर में, कोई कहीं और। तालाब बनवाये, धर्मशाला बनवाये, कुछ भी करे। देशको वही ज़रुरत है। ग़रीब लड़कियों की शादी करवाएं, ग़रीबों को दान दें, सहायता करें। स्कूल चलायें, कॉलेज चलायें, अस्पताल चलायें, गौशाला चलायें। टैक्स भी तो इसी में खर्च होता है। बजाय बैंक में जमा होने के, इस तरह खर्च हो तो अच्छा है। अगर आकर जमा हो गया तो फिर तकलीफ करेगा।
प्रश्न .................
गुरुकुल बना रहे हैं। मथुरा में, बम्बई में, भीलवाडा में - इस तरह छः  बना रहे हैं। उसमे रोज़गार पर आधारित ही पढ़ाई होगी।
 प्रश्न .................
जिनको कारीगर बनाना है , वे अपने बच्चों को भेजेंगे। कलेक्टरों की कुल पोस्ट हिंदुस्तान में 680 है। तो सब बच्चे तो कलेक्टर नहीं बन सकते। 680 से ज्यादा तो  बन नहीं सकते। उनको यह बात समजानी पड़ेगी की एक साल में 680 ही कलेक्टर बनते हैं और एक साल में एक करोड़ बच्चे पैदा होते हैं, तो क्या करेंगे बाद में। कोई कारीगर बनेगा, कोई वैद्य बनेगा, कोई इंजिनियर बनेगा, कोई पढ़ायेगा, कोई खेती करेगा। खेती करने वाले ज्यादा हो सकते हैं। कारीगर दूसरे  नंबर पर, स्वयं रोज़गार करने वाले तीसरे नंबर पर। नौकरी में तो अब ज्यादा नहीं जाने वाले। नौकरी है ही नहीं।
प्रश्न .................
स्वयं का रोज़गार करें, अपनी कंपनी चलाये। पैसे बैंक उधार देगी, बहुत बैंक तैयार हैं। व्यक्तिगत लोन भी देती हैं, और अगर कोई इंजीनियरी फर्म  बनाओ तो उसे भी लोन देती है। बहुत लोग हैं जिन्होंने इंजीनियरी  करके अपनी फैक्ट्री लगाईं।
 प्रश्न .................
हमने तो (गुरुकुल के लिए) ज़मीन ली है - पिचहत्तर  से अस्सी  एकड़। लेकिन अगर पांच एकड़ भी हो तो हो सकता है उसमें।
प्रश्न .................
हाँ, सिलेबस तैयार हो गया है, मई से शुरू करने जारहे हैं।
 प्रश्न ................
करो। पहले बना लो उसको। सिलेबस हम देदेंगे। और ऐसे बहुत बच्चे मिलेंगे, गाँव के ग़रीब  बच्चे जिनके पास पढने को पैसा नहीं है। वे आजायेंगे तुम्हारे यहाँ पढने।
उनको किसी को कलेक्टर नहीं बनना है।
प्रश्न ................
मई से हम दिखा देंगे, अपना शुरू हो जाएगा। बम्बई वाला सबसे पहले चालू होगा। बिल्डिंग बन गई है। पांच बड़े हॉल बने हैं। और थोडा, दो तीन और बाक़ी हैं। हम करीब 450-500 बच्चों के आवास के हिसाब से बना रहे हैं। बच्चे वहीँ रहेंगे। साल में दो महीने छुट्टी। एक महीने की गर्मी में, और एक महीने दिवाली, दशहरे पर। जो वे काम करेंगे, उसी से उनका सार खर्च चलेगा। हर बच्चा रोज़ दो घंटे चरखा चलाएगा। एक दो घंटा खेत में काम करेगा। इक घंटा और दूसरे उत्पादन करेगा। उसी से खर्च चलेगा। बचा हुआ गुरुकुल में काम आएगा। 15-20 उत्पादन सरल वस्तुओं का उत्पादन जैसे टूथ पाउडर, टॉयलेट क्लीनर, आदि। और हमने नियम यह रखा है की जो पढ़ेगा, वह अर्थात उसका परिवार, स्कूल की ही चीज़ें खरीदेगा, इसी शर्त पर हम दाखिला करेंगे। हम कोई डोनेशन या फीस नहीं लेंगे। बस हर महीने जो आपका सामान लगता है, वह यहाँ से लेंगे। तो उससे क्या होगा ? 500 बच्चे पढ़ रहे हैं तो 500 परिवार तो अपने ग्राहक हो गए। और उन परिवारों का एक एक सम्बन्धी भी हमारा ग्राहक हुआ तो 1000 हो गए। दो दो हुए तो 1500 हो गए। उतने में गुरुकुल आराम से चलेगा। पहले सात साल बेसिक शिक्षा देंगे, फिर सात साल उनको हायर एजुकेशन, अर्थात शिक्षा देंगे। गणित, भाषा, फिर प्रकृति जगत की जो सारी  चीज़ें हैं ये। फिर अगले सात साल में उनको विशेष अभ्यास करायेंगे।
प्रश्न ................
आर्य समाज के गुरुकुल और इसमें थोड़ा फर्क है। आर्य समाज के गुरुकुल में वही  सिलेबस पढ़ाते हैं जो सरकार बताती है। हमने अपना सिलेबस अलग बनाया है।
 प्रश्न ................
मास्टर तो उसे तैयार करेंगे जो परमानेंट हो। ट्रेनिंग अभी शुरू किया है। मई से उनके ट्रेनिंग कैंप शरू हो रहे हैं। अभी हम जो बम्बई का बना रहे हैं, वह लगभग ढाई करोड़ में बना है।
 प्रश्न ................
अगर बना बनाया भवन मिल जाए तो बीस पच्चीस हज़ार में शुरू हो सकता है। बनाना हो तो जो बनाने का खर्चा है। मान लो चार पांच कमरे हों, एक हाल हो। ज़रूरी नहीं है की पक्का बने। कच्चा बना लो। ईंट, बांस आदि से। अवन महत्त्व का नहीं है। जो पढ़ाया जाएगा, वह महत्त्व का है। और हम क्या कर रहे हैं की हर एक के साथ गौशाला बने है, खेती रखी है। ज़रूरी नहीं है की तुम आवासीय बनाओ। स्कूल चलो, सुबह से शाम पढाओ, बाकी छुट्टी। अपने घर जाएँ, फिर दूसरे दिन आयें तो खर्च कम आएगा।  मास्टरों के लिए हमने सोचा है की मास्टर भी उत्पादन का काम  करें, और बच्चे भी। अर्थात उत्पादन करते करते सीखें। सिर्फ सीखना अपने आप में कोई बड़ा काम नहीं है। उत्पादन करना ज्यादा बड़ा काम है। आर्थिक सहयोग यह की वे जितना ज्यादा बनाएं, वह बीके और उसका पैसा उन्हें  मिले। जैसे हमने साबुन बनाया। अब, जो बड़े मास्टर हैं, वे तो मेहनत कर सकते हैं। दिन में दस बीस किलो साबुन बना सकते हैं। या दिन में दस बीस किलो वाशिंग पाउडर बना सकते हैं। या रोज़ चरखा चलकर सूत बना सकते हैं। तो उससे उनकी आमदनी होगी। खेती होगी, गौशाला है, उनकी आमदनी होगी। शिक्षा को हम उत्पादन से जोड़ना चाहते हैं। काम करते करते सीखना। सीखते सीखते काम करना। खाली सीखने का कोई अर्थ नहीं होता।
प्रश्न ................
मातृ भाषा। अंग्रेजी को भाषा के रूप में पढ़ाएंगे पर बहुत बाद में। और अंग्रेजी माध्यम नहीं रहेगी, सिर्फ भाषा के रूप में पढ़ाई जायेगी। इतिहास, भूगोल सब पढ़ाएंगे। परन्तु, कैसा इतिहास, कैसा भूगोल, यह महत्त्वपूर्ण है। जैसा उसका खुद का इतिहास पहले पढ़ाएंगे। वह कहाँ पैदा हुआ, किस परिवार में पैदा हुआ, उसके परिवार का व्यवसाय क्या है, वह परिवार जिस गाँव में रहता है, उसका इतिहास क्या है, जिस तहसील में है, उसका इतिहास क्या है, जिस जिले में है, उसका इतिहास क्या है, जिस राज्य में है, उसका इतिहास क्या है, राज्य जिस देश में उसका इतिहास क्या है। इसी तरह भूगोल, उसका अपना भूगोल, पड़ोस का भूगोल, जिस गाँव में वह रहता है, उसका भूगोल।  यह नहीं कि  अकबर बादशाह का इतिहास, जहांगीर का, हुमायूँ का। वह पढ़ाएंगे, पर बहुत थोडा। मुख्य तो यह है की अपना इतिहास वह ज्यादा जाने। और वह काम भी आएगा उसके जीवन में। और ऐसे ही पूरा ब्रह्माण्ड विज्ञान उसको पढ़ाएंगे। प्रकृति क्या है, इसकी व्यवस्था क्या है, पेड़ पौधे क्या हैं, जीव जंतु क्या हैं, इनका आपस में सम्बन्ध क्या है। एक दूसरे  की एक दूसरे  पर निर्भरता  क्या है, किसकी किसको ज़रुरत है, यह सब। चन्द्रमा क्या है, सूरज क्या है, इनकी भूमिका क्या है। और यह ज्ञान लेकर जब कोई निकलेगा, तो उसे किसी नौकरी की ज़रुरत नहीं। हमने यह करके देखलिया है। इसके रिजल्ट आचुके हैं। हमारे एक दोस्त हैं, उनके साथ एक गाँव मसूरी में, ऐसा एक स्कूल चला कर देखा। और उसके विद्यार्थियों को पढाकर देखा। बहुत अच्छे परिणाम हुए। डॉन  बोस्को के  पीछे हमारा ही स्कूल चलता है। उस स्कूल में हमने जो शुरू किया, तो जितने बच्चों को पढाया, वे आज इतने एक्सपर्ट हैं कि  कोई वैज्ञानिक उनसे बात नहीं कर सकता, उन्हें अपने विषय का इतना ज्ञान है। सौर विज्ञान के बारे में जितना वे जानते हैं, कोई वैज्ञानिक नहीं जानता, पक्षियों के बारे में जितना वे जानते हैं, कोई, वैज्ञानिक नहीं जानता। प्रकृति के बारे में इतना जानते हैं कि  कोई नेचुरोलोजिस्ट  नहीं जानता। और जो बच्चे फेल  हुए थे हमने वे सब लिए थे - सातवीं में फेल  हो गए, आठवीं में फेल  होगये वे। जब फेल हुए बच्चे इतने एक्सपर्ट हो गए, तो जो होशियार हैं वे तो और ज्यादा होने वाले हैं। और वे सब कारीगरी में आ गए। वे सब अपना अपना काम कर रहे हैं। कुछ बच्चे अच्छा साबुन, मंजन बना रहे हैं, कुछ जूते, चप्पल बना रहे हैं। कुछ खाड़ी के कपडे बना रहे हैं। सब अपना रोज़गार चला रहे हैं। कोई खेती कर रहा है। कोई बेरोजगार नहीं है।
 प्रश्न ................
है न। उसकी ट्रेनिंग देंगे हम। मूर्ति  कला, काष्ठ कला। धातु कर्म (metallurgy) ऐसी बारह तरह की कलाएं सिखायेंगे।
 प्रश्न ................
इकठ्ठा करो चार पांच लोगों को, सिलेबस हम देदेंगे। अध्यापकों की ट्रेनिंग करा देंगे। चलता रहेगा। प्रिंसिपल कौन हो, मेनेजर कौन हो यह महत्त्वपूर्ण नहीं है, करना क्या है वह महत्त्वपूर्ण है।
प्रश्न ................
अगले साल तक छः  ऐसे गुरुकुल हो जायेंगे, फिर उससे अगले साल सात फिर और अधिक।2009 तक हमारा उद्देश्य है करीब 40 गुरुकुल स्थापित करना।
 प्रश्न ................
दक्षिण में हैं, कर्णाटक, आन्ध्र, महाराष्ट्र, तमिलनाडु में। हमारे सबसे कम कार्यकर्ता हिंदी वाले हैं। 
प्रश्न ................
हम किसी चीज़ को स्टेटस सिंबल तब बनाते हैं जब दूसरों की देखा देहि काम करते हैं। हम दूसरों की नक़ल न करें, ज़रुरत आधारित काम करें। जैसे की जब आप घर में हैं टी मोबाइल का बिलकुल प्रयोब न करें, लैंडलाइन से बात करें। घरके बाहर हैं, तभी थोडा करें। ज्यादा लोग घरों में ही रहते हैं। जहाँ लैंडलाइन उपलब्ध है, वहां इसका प्रयोग न करें। बता कर रखें की यहाँ ओअर हूँ, कोई काम हो तो यहाँ पर फ़ोन करें। मैंने कई लोगों को देखा है कि  उनके दफ्तर में लैंडलाइन है फिर भी मोबाइल रखते हैं। इसकी तुलना में लैंडलाइन पूरा सुरक्षित है। जब कान पर लगा कर बात करो तब ही वेव्स से मस्तिष्क ज्यादा प्रभावित होता है। बाकी तो वेव्स को घूमने दो वातावरण में। जब रिसीव कर रहे हो तब प्रभाव ज्यादा पड़ेगा।
 प्रश्न ................
मोबाइल ह्रदय और मस्तिष्क दोनों को प्रभावित करता है।  माइक और हैडफ़ोन ज्यादा सुरक्षित है। ईयरफ़ोन कान में लगाकर माइक पर बात करो, वह ज्यादा सुरक्षित है।
 प्रश्न ................
अभी सब बैंक बिकने जा रहे हैं। भारत सरकार खुली छूट देने जा रही है। कोई भी विदेशी बैंक आकर किसी भी बैंक को खरीद सकता है। वह WTO  की एक शर्त है। जैसे सरकार पब्लिक सेक्टर को बेच रही है, वैसे ही बेंकों को बेचेगी अगले साल से यह शुरू हो जाएगा। यूनियन बैंक सबसे पहले बिकने वाला है।
बैंक ऑफ़ इंडिया, यूनियन बैंक फिर पंजाब नेशनल बैंक। और इनको खरीदेंगे सिटी बैंक ऑफ़ अमेरिका, स्टैण्डर्ड चार्टर्ड आदि। या भारत के पूँजी पति खरीदेंगे। यह अम्बानी दो चार बैंक खरीद लेगा। नुस्ली वाडिया खरीद लेगा।
 प्रश्न ................
और क्या? NPA  थोड़े ही अपने सिर  पर  लेगा। वह क्यों लेगा इनको?
 प्रश्न ................
सबसे बड़ा नुकसान यह है कि  आप जहाँ पर अपनी जमापूंजी रखते हो, वह बैंक अभी सरकार के नियंत्रण में है। जनता की संपत्ति है। वह सब प्राइवेट लोगों के हाथ में चला जाये, और वह सब संपत्ति लेकर भाग जाए, यह क्या गारंटी है ? सरकार प्राइवेट बेंकों की गारंटी थोड़े ही लेगी। जब प्राइवेट कंपनी के हाथ में बैंक होगा तो सरकार क्या ज़िम्मेदारी लेगी? जबतक बैंक सरकार की मिलकियत है, तो उसकी ज़िम्मेदारी है, सरकार भुगतान करती है। और प्राइवेट हो जाए तो कोई सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं है। जब प्राइवेट बैंक दिवालिये  होते हैं तो बेचारे लोग फडफडाते रहते हैं। पैसा डूब जाता है। सरकार किसी  को कभी पैसा नहीं दिलवाती। कुछ दिन बोलते हैं, फिर भूल जाते हैं लोग। क्या करें, कहाँ तक लड़ें ?

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